भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 849, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 849

खद्योतवदभिज्ञातं तन्मया विद्धमन्तिकात् । एतच्छ्रुत्वा तु वल्मीकं शर्यातिस्तूर्णमभ्ययात् ॥ २१ ॥ तत्रापश्यत् तपोवृद्धं वयोवृद्धं च भार्गवम् । अयाचदथ सैन्यार्थं प्राञ्जलिः पृथिवीपतिः ॥ २२ ॥ 'आप अपनी रुचिके अनुसार सभी उपायोंद्वारा इसका पता लगावें।' तब राजा शर्यातिने साम और उग्रनीतिके द्वारा सभी सुहृदोंसे पूछा; परंतु वे भी इसका पता न लगा सके। तदनन्तर सुकन्याने सारी सेनाको मलावरोधके कारण दुःखसे पीड़ित और पिताको भी चिन्तित देख इस प्रकार कहा—'तात! मैंने इस वनमें घूमते समय एक बाँबीके भीतर कोई चमकीली वस्तु देखी, जो जुगनूके समान जान पड़ती थी। उसके निकट जाकर मैंने उसे काँटेसे बींध दिया।' यह सुनकर शर्याति तुरंत ही बाँबीके पास गये। वहाँ उन्होंने तपस्यामें बढ़े-चढ़े वयोवृद्ध महात्मा च्यवनको देखा और हाथ जोड़कर अपने सैनिकोंका कष्ट निवारण करनेके लिये याचना की— ॥ १८—२२ ॥ अज्ञानाद् बालया यत् ते कृतं तत् क्षन्तुमर्हसि । ततोऽब्रवीन्महीपालं च्यवनो भार्गवस्तदा ॥ २३ ॥ अपमानादहं विद्धो ह्यनया दर्पपूर्णया । रूपौदार्यसमायुक्तां लोभमोहबलात्कृताम् ॥ २४ ॥ तामेव प्रतिगृह्याहं राजन् दुहितरं तव । क्षंस्यामीति महीपाल सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २५ ॥ 'भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसे आप कृपापूर्वक क्षमा करें।' उनके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन च्यवनने राजासे कहा—'राजन्! तुम्हारी इस पुत्रीने अहंकारवश अपमानपूर्वक मेरी आँखें फोड़ी हैं, अतः रूप और उदारता आदि गुणोंसे युक्त तथा लोभ और मोहके वशीभूत हुई तुम्हारी इस कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके ही मैं इसका अपराध क्षमा कर सकता हूँ। भूपाल! यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ' ॥ २३—२५ ॥

लोमश उवाच

ऋषेर्वचनमाज्ञाय शर्यातिरविचारयन् । ददौ दुहितरं तस्मै च्यवनाय महात्मने ॥ २६ ॥ लोमशजी कहते हैं—च्यवन ऋषिका यह वचन सुनकर राजा शर्यातिने बिना कुछ विचार किये ही महात्मा च्यवनको अपनी पुत्री दे दी ॥ २६ ॥ प्रतिगृह्य च तां कन्यां भगवान् प्रससाद ह । प्राप्तप्रसादो राजा वै ससैन्यः पुरमाव्रजत् ॥ २७ ॥