महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंभ्रातृस्नेहादिदं राजा संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥ महाराज धृतराष्ट्र विदुरकी याद आनेसे मोहित हो पश्चात्तापसे खिन्न हो उठे और भ्रातृस्नेहवश संजयसे पुनः इस प्रकार बोले— ॥ ७ ॥ गच्छ संजय जानीहि भ्रातरं विदुरं मम । यदि जीवति रोषेण मया पापेन निर्धुतः ॥ ८ ॥ संजय! जाओ, मेरे भाई विदुरका पता लगाओ। मुझ पापीने क्रोधवश उन्हें निकाल दिया। वे जीवित तो हैं न? ॥ ८ ॥ न हि तेन मम भ्रात्रा सुसूक्ष्ममपि किंचन । व्यलीकं कृतपूर्वं वै प्राज्ञेनामितबुद्धिना ॥ ९ ॥ ‘अपरिमित बुद्धिवाले मेरे उन विद्वान् भाईने पहले कभी कोई छोटा-सा भी अपराध नहीं किया है ॥ ९ ॥ स व्यलीकं परं प्राप्तो मत्तः परमबुद्धिमान् । त्यक्ष्यामि जीवितं प्राज्ञ तं गच्छानय संजय ॥ १० ॥ ‘बुद्धिमान् संजय! मुझसे परम मेधावी विदुरका बड़ा अपराध हुआ। तुम जाकर उन्हें ले आओ, नहीं तो मैं प्राण त्याग दूँगा’ ॥ १० ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राज्ञस्तमनुमान्य च । संजयो बाढमित्युक्त्वा प्राद्रवत् काम्यकं प्रति ॥ ११ ॥ सोऽचिरेण समासाद्य तद् वनं यत्र पाण्डवाः । रौरवाजिनसंवीतं ददर्शाथ युधिष्ठिरम् ॥ १२ ॥ विदुरेण सहासीनं ब्राह्मणैश्च सहस्रशः । भ्रातृभिश्चाभिसंगुप्तं देवैरिव पुरंदरम् ॥ १३ ॥ राजाका यह वचन सुनकर संजयने उनका आदर करते हुए ‘बहुत अच्छा’ कहकर काम्यकवनको प्रस्थान किया। जहाँ पाण्डव रहते थे, उस वनमें शीघ्र ही पहुँचकर संजयने देखा, राजा युधिष्ठिर मृगचर्म धारण करके विदुरजी तथा सहस्रों ब्राह्मणोंके साथ बैठे हुए हैं। और देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति अपने भाइयोंसे सुरक्षित हैं ॥ ११—१३ ॥ युधिष्ठिरमुपागम्य पूजयामास संजयः । भीमार्जुनयमाश्चापि तद्युक्तं प्रतिपेदिरे ॥ १४ ॥ युधिष्ठिरके पास पहुँचकर संजयने उनका सम्मान किया। फिर भीम, अर्जुन और नकुल-सहदेवने संजयका यथोचित सत्कार किया ॥ १४ ॥ राज्ञा पृष्टः स कुशलं सुखासीनश्च संजयः । शशंसागमने हेतुमिदं चैवाब्रवीद् वचः ॥ १५ ॥ राजा युधिष्ठिरके कुशल-प्रश्न करनेके पश्चात् जब संजय सुखपूर्वक बैठ गया, तब अपने आनेका कारण बताते हुए उसने इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥