महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 862, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमुक्तस्य शक्रेण भार्गवस्य महात्मनः ॥ ७ ॥ स मन्युर्व्यगमच्छीघ्रं मुमोच च पुरंदरम् । मदं च व्यभजद् राजन् पाने स्त्रीषु च वीर्यवान् ॥ ८ ॥ अक्षेषु मृगयायां च पूर्वसृष्टं पुनः पुनः । तदा मदं विनिक्षिप्य शक्रं संतर्प्य चेन्दुना ॥ ९ ॥ अश्विभ्यां सहितान् देवान् याजयित्वा च तं नृपम् । विख्याप्य वीर्यं लोकेषु सर्वेषु वदतां वरः ॥ १० ॥ सुकन्यया सहारण्ये विजहारानुकूलया । तस्यैतद् द्विजसंघुष्टं सरो राजन् प्रकाशते ॥ ११ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन महामना च्यवनका क्रोध शीघ्र शान्त हो गया और उन्होंने देवेन्द्रको (उसी क्षण) सम्पूर्ण दुःखोंसे, मुक्त कर दिया। राजन्! उन शक्तिशाली ऋषिने मदको, जिसे पहले उन्होंने ही उत्पन्न किया था, मद्यपान, स्त्री, जूआ और मृगया (शिकार)—इन चार स्थानोंमें पृथक्-पृथक् बाँट दिया। इस प्रकार मदको दूर हटाकर उन्होंने देवराज इन्द्र और अश्विनीकुमारोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको सोमरससे तृप्त किया तथा राजा शर्यातिके यज्ञ पूर्ण कराकर समस्त लोकोंमें अपनी अद्भुत शक्तिको विख्यात करके वक्ताओंमें श्रेष्ठ च्यवन ऋषि अपनी मनोनुकूल पत्नी सुकन्याके साथ वनमें विहार करने लगे। युधिष्ठिर! यह जो पक्षियोंके कलरवसे गूँजता हुआ सरोवर सुशोभित हो रहा है, महर्षि च्यवनका ही है ॥ ७—११ ॥
अत्र त्वं सह सोदर्यैः पितॄन् देवांश्च तर्पय । एतद् दृष्ट्वा महीपाल सिकताक्षं च भारत ॥ १२ ॥ सैन्धवारण्यमासाद्य कुल्यानां कुरु दर्शनम् । पुष्करेषु महाराज सर्वेषु च जलं स्पृश ॥ १३ ॥ स्थाणोर्मन्त्राणि च जपन् सिद्धिं प्राप्स्यसि भारत । संधिर्द्वयोर्नरश्रेष्ठ त्रेताया द्वापरस्य च ॥ १४ ॥ तुम भाइयोंसहित इसमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करो। भूपाल! भरतनन्दन! इस सरोवरका और सिकताक्षतीर्थका दर्शन करके सैन्धवारण्यमें पहुँचकर वहाँकी छोटी-छोटी नदियोंके दर्शन करना। महाराज! यहाँके सभी तालाबमें जाकर जलका स्पर्श करो। भारत! स्थाणु (शिव)-के मन्त्रोंका जप करते हुए उन तीर्थोंमें स्नान करनेसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। नरश्रेष्ठ! यह त्रेता और द्वापरकी संधिके समय प्रकट हुआ तीर्थ है ॥ १२—१४ ॥
अयं हि दृश्यते पार्थ सर्वपापप्रणाशनः । अत्रोपस्पृश्य चैव त्वं सर्वपापप्रणाशने ॥ १५ ॥