महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 866, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने एक सहस्र अश्वमेधयज्ञ पूर्ण करके बहुत दक्षिणाके साथ दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा भी भगवान्की आराधना की ॥ ६ ॥ अनपत्यस्तु राजर्षिः स महात्मा महाव्रतः। मन्त्रिष्वाधाय तद् राज्यं वननित्यो बभूव ह ॥ ७ ॥ शास्त्रदृष्टेन विधिना संयोज्यात्मानमात्मवान्। स कदाचिन्नृपो राजन्नुपवासेन दुःखितः ॥ ८ ॥ पिपासाशुष्कहृदयः प्रविवेशाश्रमं भृगोः। तामेव रात्रिं राजेन्द्र महात्मा भृगुनन्दनः ॥ ९ ॥ इष्टिं चकार सौद्युम्नेर्महर्षिः पुत्रकारणात् । सम्भृतो मन्त्रपूतेन वारिणा कलशो महान् ॥ १० ॥ वे महामना राजर्षि महान् व्रतका पालन करनेवाले थे तो भी उनके कोई संतान नहीं हुई। तब वे मनस्वी नरेश राज्यका भार मन्त्रियोंपर रखकर शास्त्रीय विधिके अनुसार अपने-आपको परमात्म-चिन्तनमें लगाकर सदा वनमें ही रहने लगे। एक दिनकी बात है, राजा युवनाश्व उपवासके कारण दुःखित हो गये। प्याससे उनका हृदय सूखने लगा। उन्होंने जल पीनेकी इच्छासे रातके समय महर्षि भृगुके आश्रममें प्रवेश किया। राजेन्द्र! उसी रातमें महात्मा भृगुनन्दन महर्षि च्यवनने सुद्युम्नकुमार युवनाश्वको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये एक इष्टि की थी। उस इष्टिके समय महर्षिने मन्त्रपूत जलसे एक बहुत बड़े कलशको भरकर रख दिया था ॥ ७—१० ॥ तत्रातिष्ठत राजेन्द्र पूर्वमेव समाहितः । यत् प्राश्य प्रसवेत् तस्य पत्नी शक्रसमं सुतम् ॥ ११ ॥ महाराज! वह कलशका जल पहलेसे ही आश्रमके भीतर इस उद्देश्यसे रखा गया था कि उसे पीकर राजा युवनाश्वकी रानी इन्द्रके समान शक्तिशाली पुत्रको जन्म दे सके ॥ ११ ॥ तं न्यस्य वेद्यां कलशं सुषुपुस्ते महर्षयः। रात्रिजागरणाच्छ्रान्तान् सौद्युम्निः समतीत्य तान् ॥ १२ ॥ उस कलशको वेदीपर रखकर सभी महर्षि सो गये थे। रातमें देरतक जागनेके कारण वे सब-के-सब थके हुए थे। युवनाश्व उन्हें लाँघकर आगे बढ़ गये ॥ १२ ॥ शुष्ककण्ठः पिपासार्तः पानीयार्थी भृशं नृपः। तं प्रविश्याश्रमं शान्तः पानीयं सोऽभ्ययाचत ॥ १३ ॥ वे प्याससे पीड़ित थे। उनका कण्ठ सूख गया था। पानी पीनेकी अत्यन्त अभिलाषासे वे उस आश्रमके भीतर गये और शान्तभावसे जलके लिये याचना करने लगे ॥ १३ ॥ तस्य श्रान्तस्य शुष्केण कण्ठेन क्रोशतस्तदा। नाश्रौषीत् कश्चन तदा शकुनेरिव वाशतः ॥ १४ ॥