महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षान्त उष्यात्र षड्ररात्रं प्राप्नोति सुगतिं नरः ॥ २० ॥ यह उन्हीं राजा सोमकका पवित्र आश्रम है जो सामने ही सुशोभित हो रहा है। यहाँ क्षमाशील होकर छः रात निवास करनेसे मनुष्य उत्तम गति प्राप्त कर लेता है ॥ एतस्मिन्नपि राजेन्द्र वत्स्यामो विगतज्वराः । षड्ररात्रं नियतात्मानः सज्जीभव कुरूद्वह ॥ २१ ॥ कुरुश्रेष्ठ! हम सब लोग इस आश्रममें छः राततक मन और इन्द्रियोंपर संयम रखते हुए निश्चिन्त होकर निवास करेंगे। तुम इसके लिये तैयार हो जाओ ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां जन्तूपाख्याने अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें जन्तूपाख्यानविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल २१ १/२ श्लोक हैं)