महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूर्यके समान तेजस्वी नरेश! यह प्रभासतीर्थ* प्रकाशित हो रहा है, जो इन्द्रको बहुत प्रिय है। यह पुण्यमय क्षेत्र सब पापोंका नाश करनेवाला और परम पवित्र है ।। ७ ।। एतद् विष्णुपदं नाम दृश्यते तीर्थमुत्तमम् । एषा रम्या विपाशा च नदी परमपावनी ।। ८ ।। अत्र वै पुत्रशोकेन वसिष्ठो भगवानृषिः । बद्ध्वाऽऽत्मानं निपतितो विपाशः पुनरुत्थितः ।। ९ ।। यह विष्णुपद नामवाला उत्तम तीर्थ दिखायी देता है तथा यह परम पावन और मनोरम विपाशा (व्यास) नदी है। यहीं भगवान् वसिष्ठ मुनि पुत्रशोकसे पीड़ित हो अपने शरीरको पाशोंसे बाँधकर कूद पड़े थे, परंतु पुनः विपाश (पाशमुक्त) होकर जलसे बाहर निकल आये ।। ८-९ ।। काश्मीरमण्डलं चैतत् सर्वपुण्यमरिंदम । महर्षिभिश्चाध्युषितं पश्येदं भ्रातृभिः सह ।। १० ।। यत्रोत्तराणां सर्वेषामृषीणां नाहुषस्य च । अग्नेश्चैवात्र संवादः काश्यपस्य च भारत ।। ११ ।। शत्रुदमन! यह पुण्यमय काश्मीरमण्डल है, जहाँ बहुत-से महर्षि निवास करते हैं। तुम भाइयोंसहित इसका दर्शन करो। भारत! यह वही स्थान है जहाँ उत्तरके समस्त ऋषि, नहुषकुमार ययाति, अग्नि और काश्यपका संवाद हुआ था ।। १०-११ ।। एतद् द्वारं महाराज मानसस्य प्रकाशते । वर्षमस्य गिरेर्मध्ये रामेण श्रीमता कृतम् ।। १२ ।। महाराज! यह मानसरोवरका द्वार प्रकाशित हो रहा है। इस पर्वतके मध्यभागमें परशुरामजीने अपना आश्रम बनाया था ।। १२ ।। एष वातिकषण्डो वै प्रख्यातः सत्यविक्रमः । नात्यवर्तत यद्द्वारं विदेहादुत्तरं च यः ।। १३ ।। युधिष्ठिर! परशुरामजी सर्वत्र विख्यात हैं। वे सत्यपराक्रमी हैं। उनके इस आश्रमका द्वार विदेह देशसे उत्तर है। यह बवंडर (वायुका तूफान) भी उनके इस द्वारका कभी उल्लंघन नहीं कर सकता है (फिर औरोंकी तो बात ही क्या है) ।। १३ ।। इदमाश्चर्यमपरं देशेऽस्मिन् पुरुषर्षभ । क्षीणे युगे तु कौन्तेय शर्वस्य सह पार्षदैः ।। १४ ।। सहोमया च भवति दर्शनं कामरूपिणः । अस्मिन् सरसि सत्रैवै चैत्रे मासि पिनाकिनम् ।। १५ ।। यजन्ते याजकाः सम्यक् परिवारं शुभार्थिनः । अत्रोपस्पृश्य सरसि श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।। १६ ।। क्षीणपापः शुभाँल्लोँकान् प्राप्नुते नात्र संशयः ।