भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 890, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 890

आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते । आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः ॥ ७ ॥ बाजने कहा—महाराज! सब प्राणी आहारसे ही उत्पन्न होते हैं, आहारसे ही उनकी वृद्धि होती है और आहारसे ही जीवित रहते हैं ॥ ७ ॥

शक्यते दुस्त्यजेऽप्यर्थे चिररात्राय जीवितुम् । न तु भोजनमुत्सृज्य शक्यं वर्तयितुं चिरम् ॥ ८ ॥ जिसको त्यागना बहुत कठिन है, उस अर्थके बिना भी मनुष्य बहुत दिनोंतक जीवित रह सकता है, परंतु भोजन छोड़ देनेपर कोई भी अधिक समयतक जीवन धारण नहीं कर सकता ॥ ८ ॥

भक्ष्याद् वियोजितस्याद्य मम प्राणा विशाम्पते । विसृज्य कायमेष्यन्ति पन्थानमकुतोभयम् ॥ ९ ॥ प्रमृते मयि धर्मात्मन् पुत्रदारादि नङ्क्ष्यति । रक्षमाणः कपोतं त्वं बहून् प्राणान् न रक्षसि ॥ १० ॥ प्रजानाथ! आज आपने मुझे भोजनसे वंचित कर दिया है, इसलिये मेरे प्राण इस शरीरको छोड़कर अकुतोभय-पथ (मृत्यु)-को प्राप्त हो जायँगे। धर्मात्मन्! इस प्रकार मेरी मृत्यु हो जानेपर मेरे स्त्री-पुत्र आदि भी (असहाय होनेके कारण) नष्ट हो जायँगे। इस तरह आप एक कबूतरकी रक्षा करके बहुत-से प्राणियोंकी रक्षा नहीं कर रहे हैं ॥ ९-१० ॥

धर्मं यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्म तत् । अविरोधात् तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम ॥ ११ ॥ सत्यपराक्रमी नरेश! जो धर्म दूसरे धर्मका बाधक हो वह धर्म नहीं, कुधर्म है। जो दूसरे किसी धर्मका विरोध न करके प्रतिष्ठित होता है वही वास्तविक धर्म है ॥

विरोधिषु महीपाल निश्चित्य गुरुलाघवम् । न बाधा विद्यते यत्र तं धर्मं समुपाचरेत् ॥ १२ ॥ परस्परविरुद्ध प्रतीत होनेवाले धर्मोंमें गौरव-लाघवका विचार करके, जिसमें दूसरोंके लिये बाधा न हो उसी धर्मका आचरण करना चाहिये ॥ १२ ॥

गुरुलाघवमादाय धर्माधर्मविनिश्चये । यतो भूयांस्ततो राजन् कुरुष्व धर्मनिश्चयम् ॥ १३ ॥ राजन्! धर्म और अधर्मका निर्णय करते समय पुण्य और पापके गौरव-लाघवपर ही दृष्टि रखकर विचार कीजिये तथा जिसमें अधिक पुण्य हो उसीको आचरणमें लाने योग्य धर्म ठहराइये ॥ १३ ॥

राजोवाच

बहुकल्याणसंयुक्तं भाषसे विहगोत्तम ।

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