महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रसाद्य हीनं वसुना धनार्थिनी ॥ १३ ॥
जब पेटमें गर्भ बढ़ रहा था, उस समय सुजाताने उससे पीड़ित होकर एकान्तमें अपने निर्धन पतिसे धनकी इच्छा रखकर कहा— ॥ १३ ॥
कथं करिष्याम्यधुना महर्षे
मासश्चायं दशमो वर्तते मे ।
नैवास्ति ते वसु किंचित् प्रजाता
येनाहमेतामापदं निस्तरेयम् ॥ १४ ॥
‘महर्षे! यह मेरे गर्भका दसवाँ महीना चल रहा है। मैं धनहीन नारी खर्चकी कैसे व्यवस्था करूँगी। आपके पास थोड़ा-सा भी धन नहीं है जिससे मैं प्रसवकालके इस संकटसे पार हो सकूँ’ ॥ १४ ॥
उक्तस्त्वेवं भार्यया वै कहोडो
वित्तस्यार्थे जनकमथाभ्यगच्छत् ।
स वै तदा वादविदा निगृह्य
निमज्जितो बन्दिनेहाप्सु विप्रः ॥ १५ ॥
पत्नीके ऐसा कहनेपर कहोड मुनि धनके लिये राजा जनकके दरबारमें गये। उस समय शास्त्रार्थी पण्डित बन्दीने उन ब्रह्मर्षिको विवादमें हराकर जलमें डुबो दिया ॥ १५ ॥
उद्दालकस्तं तु तदा निशम्य
सूतेन वादेऽप्सु निमज्जितं तथा ।
उवाच तां तत्र ततः सुजाता-
मष्टावक्रे गूहितव्योऽयमर्थः ॥ १६ ॥
जब उद्दालकको यह समाचार मिला कि ‘कहोड मुनि शास्त्रार्थमें पराजित होनेपर सूत (बन्दी)-के द्वारा जलमें डुबो दिये गये।’ तब उन्होंने सुजातासे सब कुछ बता दिया और कहा, ‘बेटी! अपने बच्चेसे इस वृत्तान्तको सदा ही गुप्त रखना’ ॥ १६ ॥
ररक्ष सा चापि तमस्य मन्त्रं
जातोऽप्यसौ नैव शुश्राव विप्रः ।
उद्दालकं पितृवच्चापि मेने
तथाष्टावक्रो भ्रातृवच्छ्वेतकेतुम् ॥ १७ ॥
सुजाताने भी अपने पुत्रसे उस गोपनीय समाचारको गुप्त ही रखा। इसीसे जन्म लेनेके बाद भी उस ब्राह्मण-बालकको इसके विषयमें कुछ भी पता न लगा। अष्टावक्र अपने नाना उद्दालकको ही पिताके समान मानते थे और श्वेतकेतुको अपने भाईके समान समझते थे ॥ १७ ॥