भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 909

इतना ही नहीं, वे पराजित एवं तिरस्कृत हो चुपचाप राजसभासे निकल गये हैं। फिर वे अन्य सदस्योंके साथ वार्तालाप ही कैसे कर सकते हैं॥ २२॥

अष्टावक्र उवाच

विवादितोऽसौ न हि मादृशैर्हि सिंहीकृतस्तेन वदत्यभीतः। समेत्य मां निहतः शेष्यतेऽद्य मार्गे भग्नं शकटमिवाचलाक्षम्॥ २३॥

**अष्टावक्र बोले—**महाराज! अभी बन्दीको हम-जैसोंके साथ शास्त्रार्थ करनेका अवसर नहीं मिला है, इसीलिये वह सिंह बना हुआ है और निडर होकर बातें करता है। आज मुझसे जब उसकी भेंट होगी, उस समय वह पराजित होकर मुर्देकी भाँति सो जायगा। ठीक उसी तरह, जैसे रास्तेमें टूटा हुआ छकड़ा जहाँ-का-तहाँ पड़ा रह जाता है—उसका पहिया एक पग भी आगे नहीं बढ़ता॥ २३॥

राजोवाच

त्रिंशत्कद्वादशांशस्य चतुर्विंशतिपर्वणः। यस्त्रिषष्टिशतारस्य वेदार्थं स परः कविः॥ २४॥

**तब राजाने परीक्षा लेनेके लिये कहा—**जो पुरुष तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अरोंवाले पदार्थको जानता है—उसके प्रयोजनको समझता है, वह उच्चकोटिका ज्ञानी है॥ २४॥

अष्टावक्र उवाच

चतुर्विंशतिपर्व त्वां षण्णाभि द्वादशप्रधि। तत् त्रिषष्टिशतारं वै चक्रं पातु सदागति॥ २५॥

**अष्टावक्र बोले—**राजन्! जिसमें बारह अमावास्या और बारह पूर्णिमारूपी चौबीस पर्व, ऋतुरूप छः नाभि, मासरूप बारह अंश और दिनरूप तीन सौ साठ अरे हैं, वह निरन्तर घूमनेवाला संवत्सररूप कालचक्र आपकी रक्षा करे॥ २५॥

राजोवाच

वडवे इव संयुक्ते श्येनपाते दिवौकसाम्। कस्तयोर्गर्भमाधत्ते गर्भं सुषुवतुश्च कम्॥ २६॥

**राजाने पूछा—**जो दो घोड़ियोंकी भाँति संयुक्त रहती हैं; एवं जो बाज पक्षीकी भाँति हठात् गिरनेवाली हैं उन दोनोंके गर्भको देवताओंमेंसे कौन धारण करता है तथा वे दोनों किस गर्भको उत्पन्न करती हैं?॥ २६॥

अष्टावक्र उवाच