महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबन्द्युवाच
त्रिः सूयते कर्मणा वै प्रजेयं
त्रयो युक्ता वाजपेयं वहन्ति।
अध्वर्यवस्त्रिसवनानि तन्वते
त्रयो लोकास्त्रीणि ज्योतींषि चाहुः ॥ १० ॥
**बन्दीने कहा—**यह सम्पूर्ण प्रजा कर्मवश देवता, मनुष्य और तिर्यक्रूप तीन प्रकारका जन्म धारण करती है, ऋक्, साम, और यजु—ये तीन वेद ही परस्पर संयुक्त हो बाजपेय आदि यज्ञ-कर्मोंका निर्वाह करते हैं। अध्वर्युलोग भी प्रातःसवन, मध्याह्नंसवन और सायंसवनके भेदसे तीन सवनों (यज्ञों)-का ही अनुष्ठान करते हैं। (कर्मानुसार प्राप्त होनेवाले भोगोंके लिये) स्वर्ग, मृत्यु और नरक—ये लोक भी तीन ही बताये गये हैं और मुनियोंने सूर्य, चन्द्र और अग्निरूप तीन ही प्रकारकी ज्योतियाँ बतलायी हैं ॥ १० ॥
अष्टावक्र उवाच
चतुष्टयं ब्राह्मणानां निकेतं
चत्वारो वर्णा यज्ञमिमं वहन्ति।
दिशश्चतस्रो वर्णचतुष्टयं च
चतुष्पदा गौरपि शश्वदुक्ता ॥ ११ ॥
**अष्टावक्र बोले—**ब्राह्मणोंके लिये आश्रम^१ चार हैं। वर्ण^२ भी चार ही हैं जो इस यज्ञका भार वहन करते हैं। मुख्य दिशाएँ^३ भी चार ही हैं। वर्ण^४ भी चार ही हैं तथा गो अर्थात् वाणी भी सदा चार ही चरणोंसे^५ युक्त बतायी गयी है ॥ ११ ॥
बन्द्युवाच
पञ्चाग्नयः पञ्चपदा च पङ्क्ति-
र्यज्ञाः पञ्चैवाप्यथ पञ्चेन्द्रियाणि।
दृष्टा वेदे पञ्चचूडाप्सराश्च
लोके ख्यातं पञ्चनदं च पुण्यम् ॥ १२ ॥
**बन्दीने कहा—**यज्ञकी अग्नि गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, सभ्य और आवसथ्यके भेदसे पाँच प्रकारकी कही गयी है। पंक्ति^६ छन्द भी पाँच पादोंसे ही बनता है, यज्ञ भी पाँच ही हैं—देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ऋषियज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ। इसी प्रकार इन्द्रियोंकी संख्या भी पाँच ही हैं^७। वेदमें पाँच वेणीवाली