महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 940, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्न्यागारं प्रति द्वारि मया दोर्भ्यां निवारितः ॥ ७ ॥ राक्षस अपने हाथमें शूल लेकर इसका पीछा कर रहा था और यह अग्निशालामें घुसा जा रहा था। उस समय मैंने दोनों हाथोंसे पकड़कर इसे द्वारपर ही रोक लिया ॥ ७ ॥
ततः स विहताशोऽत्र जलकामोऽशुचिर्ध्रुवम् । निहतः सोऽतिवेगेन शूलहस्तेन रक्षसा ॥ ८ ॥ निश्चय ही अपवित्र होनेके कारण यह शुद्धिके लिये जल लेनेकी इच्छा रखकर यहाँ आया था, परंतु मेरे रोक देनेसे यह हताश हो गया। उस दशामें उस शूलधारी राक्षसने इसके ऊपर बड़े वेगसे प्रहार करके इसे मार डाला ॥ ८ ॥
भरद्वाजस्तु तच्छ्रुत्वा शूद्रस्य विप्रियं महत् । गतासुं पुत्रमादाय विललाप सुदुःखितः ॥ ९ ॥ शूद्रका कहा हुआ यह अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरद्वाज बड़े दुखी हो गये और अपने प्राणशून्य पुत्रको लेकर विलाप करने लगे ॥ ९ ॥
भरद्वाज उवाच
ब्राह्मणानां किलार्थाय ननु त्वं तप्तवांस्तपः । द्विजानामनधीता वै वेदाः सम्प्रतिभान्विति ॥ १० ॥ **भरद्वाजने कहा—**बेटा! तुमने ब्राह्मणोंके हितके लिये भारी तपस्या की थी। तुम्हारी तपस्याका यह उद्देश्य था कि द्विजोंको बिना पढ़े ही सब वेदोंका ज्ञान हो जाय ॥ १० ॥
तथा कल्याणशीलस्त्वं ब्राह्मणेषु महात्मसु । अनागाः सर्वभूतेषु कर्कशत्वमुपेयिवान् ॥ ११ ॥ इस प्रकार महात्मा ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारा स्वभाव अत्यन्त कल्याणकारी था। किसी भी प्राणीके प्रति तुम कोई अपराध नहीं करते थे। फिर भी तुम्हारा स्वभाव कुछ कठोर हो गया था ॥ ११ ॥
प्रतिषिद्धो मया तात रैभ्यावसथदर्शनात् । गतवानेव तं द्रष्टुं कालान्तकयमोपमम् ॥ १२ ॥ यः स जानन् महातेजा वृद्धस्यैकं ममात्मजम् । गतवानेव कोपस्य वशं परमदुर्मतिः ॥ १३ ॥ तात! मैंने तुम्हें बार-बार मना किया था कि तुम रैभ्यके आश्रमकी ओर न देखना, परंतु तुम उसे देखने चले ही गये और वह तुम्हारे लिये काल, अन्तक एवं यमराजके समान हो गया। महान् तेजस्वी होनेपर भी उसकी बुद्धि बड़ी खोटी है। वह जानता था कि मुझ बूढ़ेके तुम एक ही पुत्र हो तो भी वह दुष्ट क्रोधके वशीभूत हो ही गया ॥ १२-१३ ॥
पुत्रशोकमनुप्राप्त एष रैभ्यस्य कर्मणा । त्यक्ष्यामि त्वामृते पुत्र प्राणानिष्टतमान् भुवि ॥ १४ ॥