महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनके द्वारा यह क्रूरतापूर्ण कार्य बन गया॥ ६॥ तस्य स प्रेतकार्याणि कृत्वा सर्वाणि भारत। पुनरागम्य तत् सत्रमब्रवीद् भ्रातरं वचः॥ ७॥ इदं कर्म न शक्तस्त्वं वोढुमेकः कथंचन। मया तु हिंसितस्तातो मन्यमानेन तं मृगम्॥ ८॥ सोऽस्मदर्थे व्रतं तात चर त्वं ब्रह्महिंसनम्। समर्थोऽप्यहमेकाकी कर्म कर्तुमिदं मुने॥ ९॥ भारत! उसने पिताके समस्त प्रेतकर्म करके पुनः यज्ञमण्डपमें आकर अपने भाई अर्वावसुसे कहा—‘भैया! वह यज्ञकर्म तुम अकेले किसी प्रकार निभा नहीं सकते। इधर मैंने हिंसक पशु समझकर धोखेसे पिताजीकी हत्या कर डाली है; इसलिये तात! तुम तो मेरे लिये ब्रह्महत्यानिवारणके हेतु व्रत करो और मैं राजाका यज्ञ कराऊँगा। मुने! मैं अकेला भी इस कार्यका सम्पादन करनेमें समर्थ हूँ’॥ ७—९॥
अर्वावसुरुवाच करोतु वै भवान् सत्रं बृहद्द्युम्नस्य धीमतः। ब्रह्मवध्यां चरिष्येऽहं त्वदर्थं नियतेन्द्रियः॥ १०॥ अर्वावसु बोले—भाई! आप परम बुद्धिमान् राजा बृहद्द्युम्नका यज्ञकार्य सम्पन्न करें और मैं आपके लिये इन्द्रियसंयमपूर्वक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त करूँगा॥
लोमश उवाच स तस्य ब्रह्मवध्यायाः पारं गत्वा युधिष्ठिर। अर्वावसुस्तदा सत्रमाजगाम पुनर्मुनिः॥ ११॥ ततः परावसुर्दृष्ट्वा भ्रातरं समुपस्थितम्। बृहद्द्युम्नमुवाचेदं वचनं हर्षगद्गदम्॥ १२॥ एष ते ब्रह्महा यज्ञं मा द्रष्टुं प्रविशेदिति। ब्रह्महा प्रेक्षितेनापि पीडयेत् त्वामसंशयम्॥ १३॥ लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! अर्वावसु मुनि भाईके लिये ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त पूरा करके पुनः उस यज्ञमें आये। परावसुने अपने भाईको वहाँ उपस्थित देखकर राजा बृहद्द्युम्नसे हर्षगद्गद वाणीमें कहा—‘राजन्! यह ब्रह्महत्यारा है। अतः इसे आपका यज्ञ देखनेके लिये इस मण्डपमें प्रवेश नहीं करना चाहिये। ब्रह्मघाती मनुष्य अपनी दृष्टिमात्रसे भी आपको महान् कष्टमें डाल सकता है, इसमें संशय नहीं है’॥ ११—१३॥
लोमश उवाच तच्छ्रुत्वैव तदा राजा प्रेष्यानाह स विट्पते।