भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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ततो महात्मा स यमौ समेत्य मूर्ध्न्युपाघ्राय विमृज्य गात्रे । उवाच तौ बाष्पकलं स राजा मा भैष्टमागच्छतमप्रमत्तौ ॥ २० ॥

तत्पश्चात् महात्मा राजा युधिष्ठिरने नकुल-सहदेवके पास जाकर उनका मस्तक सूँघा और शरीरपर हाथ फेरा। फिर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए कहा—'भैया! तुम दोनों भय न करो और सावधान होकर आगे बढ़ो' ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कैलासादिगिरिप्रवेशे एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें पाण्डवोंका कैलास आदि पर्वतमालाओंमें प्रवेशविषयक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥