भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 952

करेंगे। तुम गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में एकाग्रचित्त हो मेरे आगमनकी प्रतीक्षा करो और जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक द्रौपदीकी रक्षा करते हुए वहीं निवास करो।। ६-७ ।।

भीम उवाच

राजपुत्री श्रमेणार्ता दुःखार्ता चैव भारत । व्रजत्येव हि कल्याणी श्वेतवाहदिदृक्षया ।। ८ ।। **भीमसेनने कहा—**भारत! राजकुमारी द्रौपदी यद्यपि रास्तेकी थकावटसे और मानसिक दुःखसे भी पीड़ित है; तो भी यह कल्याणमयी देवी अर्जुनको देखनेकी इच्छासे उत्साहपूर्वक हमारे साथ चल ही रही है ।। ८ ।। तव चाप्यरतिस्तीव्रा वर्तते तमपश्यतः । गुडाकेशं महात्मानं संग्रामेष्वपलायिनम् ।। ९ ।। संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले निद्राविजयी महात्मा अर्जुनको न देखनेके कारण आपके मनमें भी अत्यन्त खिन्नता हो रही है ।। ९ ।। किं पुनः सहदेवं च मां च कृष्णां च भारत । द्विजाः कामं निवर्तन्तां सर्वे च परिचारकाः ।। १० ।। सूताः पौरोगवाश्चैव यं च मन्येत नो भवान् । न ह्यहं हातुमिच्छामि भवन्तमिह कर्हिचित् ।। ११ ।। शैलेऽस्मिन् राक्षसाकीर्णे दुर्गेषु विषमेषु च । इयं चापि महाभागा राजपुत्री पतिव्रता ।। १२ ।। त्वामृते पुरुषव्याघ्र नोत्सहेद् विनिवर्तितुम् । तथैव सहदेवोऽयं सततं त्वामनुव्रतः ।। १३ ।। न जातु विनिवर्तेत मनोज्ञो ह्यहमस्य वै । अपि चात्र महाराज सव्यसाचिदिदृक्षया ।। १४ ।। सर्वे लालसभूताः स्म तस्माद् यास्यामहे सह । यद्यशक्यो रथैर्गन्तुं शैलोऽयं बहुकन्दरः ।। १५ ।। पद्भिरैव गमिष्यामो मा राजन् विमना भव । अहं वहिष्ये पाञ्चालीं यत्र यत्र न शक्ष्यति ।। १६ ।। फिर सहदेवके, मेरे तथा द्रौपदीके लिये तो कहना ही क्या है? भारत! ये ब्राह्मणलोग चाहें तो यहाँसे लौट सकते हैं। समस्त सेवक, सारथि, रसोइये तथा हममेंसे और जिस-जिसको आप लौटाना उचित समझें-वे सभी जा सकते हैं। राक्षसोंसे भरे हुए इस पर्वतपर तथा ऊँचे-नीचे दुर्गम प्रदेशोंमें मैं आपको कदापि अकेला छोड़ना नहीं चाहता। नरश्रेष्ठ! यह परम सौभाग्यवती पतिव्रता राजकुमारी कृष्णा भी आपको छोड़कर लौटनेको कभी तैयार न होंगी। इसी प्रकार यह सहदेव भी आपमें सदा अनुराग रखनेवाला है, आपको छोड़कर