भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 962

हैं ॥ ६ ॥ अत्राह्निकं सुरश्रेष्ठो जपते समरुद्गणः । साध्याश्चैवाश्विनौ चैव परिधावन्ति तं तदा ॥ ७ ॥ देवश्रेष्ठ इन्द्र भी मरुद्गणोंके साथ यहाँ आकर प्रतिदिन नियमपूर्वक जप करते हैं। उस समय साध्य तथा अश्विनीकुमार भी उनकी परिचर्यामें रहते हैं ॥ ७ ॥ चन्द्रमाः सह सूर्येण ज्योतींषि च ग्रहैः सह । अहोरात्रविभागेन नदीमेनामनुव्रजन् ॥ ८ ॥ चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और नक्षत्र भी दिन-रातके विभागपूर्वक इस पुण्य नदीकी यात्रा करते हैं ॥ ८ ॥ एतस्याः सलिलं मूर्ध्नि वृषाङ्कः पर्यधारयत् । गङ्गाद्वारे महाभाग येन लोकस्थितिर्भवेत् ॥ ९ ॥ महाभाग! गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में साक्षात् भगवान् शंकरने इसके पावन जलको अपने मस्तकपर धारण किया है, जिससे जगत्की रक्षा हो ॥ ९ ॥ एतां भगवतीं देवीं भवन्तः सर्व एव हि । प्रयतेनात्मना तात प्रतिगम्याभिवादत ॥ १० ॥ तात! तुम सब लोग मनको संयममें रखते हुए इस ऐश्वर्यशालिनी दिव्य नदीके तटपर चलकर इसे सादर प्रणाम करो ॥ १० ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लोमशस्य महात्मनः । आकाशगङ्गां प्रयताः पाण्डवास्तेऽभ्यवादयन् ॥ ११ ॥ महात्मा लोमशका यह वचन सुनकर सब पाण्डवोंने संयतचित्तसे भगवती आकाशगंगा (अलकनन्दा) को प्रणाम किया ॥ ११ ॥ अभिवाद्य च ते सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । पुनः प्रयाताः संहृष्टाः सर्वैर्ऋषिगणैः सह ॥ १२ ॥ प्रणाम करके धर्मका आचरण करनेवाले वे समस्त पाण्डव पुनः सम्पूर्ण ऋषि-मुनियोंके साथ हर्षपूर्वक आगे बढ़े ॥ १२ ॥ ततो दूरात् प्रकाशन्तं पाण्डुरं मेरुसंनिभम् । ददृशुस्ते नरश्रेष्ठा विकीर्णं सर्वतोदिशम् ॥ १३ ॥ तदनन्तर उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने एक श्वेत पर्वत-सा देखा जो मेरुगिरिके समान दूरसे ही प्रकाशित हो रहा था। वह सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखरा जान पड़ता था ॥ १३ ॥ तान् प्रष्टुकामान् विज्ञाय पाण्डवान् स तु लोमशः । उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शृणुध्वं पाण्डुनन्दनाः ॥ १४ ॥ लोमशजी ताड़ गये कि पाण्डवलोग उस श्वेत पर्वताकार वस्तुके विषयमें कुछ पूछना चाहते हैं, तब प्रवचनकी कला जाननेवाले उन महर्षिने कहा—'पाण्डवो! सुनो ॥ १४ ॥