महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! यह मन्दगतिसे चलनेवाली देवी दुःख सहन करनेके योग्य नहीं है; तो भी इसपर महान् दुःख आ पड़ा है। रास्तेके परिश्रमसे यह दुर्बल हो गयी है। आप आकर इसे सान्त्वना दें ।। ७ ।।
वैशम्पायन उवाच
राजा तु वचनात् तस्य भृशं दुःखसमन्वितः । भीमश्च सहदेवश्च सहसा समुपाद्रवन् ।। ८ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नकुलकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुखी हो गये और भीम तथा सहदेवके साथ सहसा वहाँ दौड़े आये ।। ८ ।। तामवेक्ष्य तु कौन्तेयो विवर्णवदनां कृशाम् । अङ्कमानीय धर्मात्मा पर्यदेवयदातुरः ।। ९ ।। धर्मात्मा कुन्तीनन्दनने देखा—द्रौपदीके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और उसका शरीर कृश हो गया है। तब वे उसे अंकमें लेकर शोकातुर हो विलाप करने लगे ।। ९ ।।
युधिष्ठिर उवाच
कथं वेश्मसु गुप्तेषु स्वास्तीर्णशयनोचिता । भूमौ निपतिता शेते सुखार्हा वरवर्णिनी ।। १० ।। युधिष्ठिर बोले—अहो! जो सुरक्षित सदनोंमें सुसज्जित सुकोमल शय्यापर शयन करनेयोग्य है, वह सुख भोगनेकी अधिकारिणी परम सुन्दरी कृष्णा आज पृथ्वीपर कैसे सो रही है? ।। १० ।।