भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 979

बहवः पर्वता भीम विषमा हिमदुर्गमाः । तेषु कृष्णा महाबाहो कथं नु विचरिष्यति ॥ २२ ॥ ‘महाबाहु भीम! यहाँ बहुत-से ऊँचे-नीचे पर्वत हैं, जिनपर चलना बर्फके कारण अत्यन्त कठिन है। उनपर द्रौपदी कैसे जा सकेगी?’ ॥ २२ ॥

भीमसेन उवाच

त्वां राजन् राजपुत्रीं च यमौ च पुरुषर्षभ । स्वयं नेष्यामि राजेन्द्र मा विषादे मनः कृथाः ॥ २३ ॥ **भीमसेनने कहा—**पुरुषरत्न! महाराज! आप मनमें खेद न करें। मैं स्वयं राजकुमारी द्रौपदी, नकुल-सहदेव और आपको भी ले चलूँगा ॥ २३ ॥ हैडिम्बश्च महावीर्यो विहगो मद्बलोपमः । वहेदनघ सर्वान्नो वचनात् ते घटोत्कचः ॥ २४ ॥ हिडिम्बाका पुत्र घटोत्कच भी महान् पराक्रमी है। वह मेरे ही समान बलवान् है और आकाशमें चल-फिर सकता है। अनघ! आपकी आज्ञा होनेपर वह हम सबको अपनी पीठपर बिठाकर ले चलेगा ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

अनुज्ञातो धर्मराज्ञा पुत्रं सस्मार राक्षसम् । घटोत्कचस्तु धर्मात्मा स्मृतमात्रः पितुस्तदा ॥ २५ ॥ कृताञ्जलिरुपातिष्ठदभिवाद्याथ पाण्डवान् । ब्राह्मणांश्च महाबाहुः स च तैरभिनन्दितः ॥ २६ ॥ उवाच भीमसेनं स पितरं भीमविक्रमम् । स्मृतोऽस्मि भवता शीघ्रं शुश्रूषुरहमागतः ॥ २७ ॥ आज्ञापय महाबाहो सर्वं कर्तास्म्यसंशयम् । तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्तु राक्षसं परिषस्वजे ॥ २८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर धर्मराजकी आज्ञा पाकर भीमसेनने अपने राक्षसपुत्रका स्मरण किया। पिताके स्मरण करते ही धर्मात्मा घटोत्कच हाथ जोड़े हुए वहाँ उपस्थित हुआ। उस महाबाहु वीरने पाण्डवों तथा ब्राह्मणोंको प्रणाम करके उनके द्वारा सम्मानित हो अपने भयंकर पराक्रमी पिता भीमसेनसे कहा—‘महाबाहो! आपने मेरा स्मरण किया है और मैं शीघ्र ही सेवाकी भावनासे आया हूँ, आज्ञा कीजिये; मैं आपका सब कार्य अवश्य ही पूर्ण करूँगा।’ यह सुनकर भीमसेनने राक्षस घटोत्कचको हृदयसे लगा लिया ॥ २५—२८ ॥