भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 982, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 982

धर्मराजं च धौम्यं च कृष्णां च यमजौ तथा । एकोऽप्यहमलं वोढुं किमुताद्य सहायवान् ॥ ६ ॥ अन्ये च शतशः शूरा विहङ्गाः कामरूपिणः । सर्वान् वो ब्राह्मणैः सार्धं वक्ष्यन्ति सहितानघ ॥ ७ ॥ घटोत्कच बोला—अनघ! मैं अकेला रहूँ तो भी धर्मराज युधिष्ठिर, पुरोहित धौम्य, माता द्रौपदी और चाचा नकुल-सहदेवको भी वहन कर सकता हूँ; फिर आज तो मेरे और भी बहुत-से संगी-साथी मौजूद हैं। इस दशामें आप लोगोंको ले चलना कौन बड़ी बात है? मेरे सिवा दूसरे भी सैकड़ों शूरवीर, आकाशचारी और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस मेरे साथ हैं। वे ब्राह्मणोंसहित आप सब लोगोंको एक साथ वहन करेंगे ॥ ६-७ ॥

एवमुक्त्वा ततः कृष्णामुवाह स घटोत्कचः । पाण्डूनां मध्यगो वीरः पाण्डवानपि चापरे ॥ ८ ॥ ऐसा कहकर वीर घटोत्कच तो द्रौपदीको लेकर पाण्डवोंके बीचमें चलने लगा और दूसरे राक्षस पाण्डवोंको भी (अपने-अपने कंधेपर बिठाकर) ले चले ॥ ८ ॥ लोमशः सिद्धमार्गेण जगामानुपमद्युतिः । स्वेनैव स प्रभावेण द्वितीय इव भास्करः ॥ ९ ॥

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