भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 100

'देवता, दानव, यक्ष, ऋषि, राक्षस, पितर, गन्धर्व और भूत—जो भी आपके नेत्रोंके सामने आ जायेंगे, उन्हें देखते ही आप उनका तेज हर लेंगे और बलवान् हो जायेंगे। अतः सदा धर्मको सामने रखते हुए आप सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति होइये ।। ७-८ ।। ब्रह्मर्षींश्चापि देवांश्च गोपायस्व त्रिविष्टपे । अभिषिक्तः स राजेन्द्र ततो राजा त्रिविष्टपे ।। ९ ।। 'आप स्वर्गमें रहकर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंका पालन कीजिये।' युधिष्ठिर! तदनन्तर राजा नहुषका स्वर्गमें इन्द्रके पदपर अभिषेक हुआ ।। ९ ।। धर्मं पुरस्कृत्य तदा सर्वलोकाधिपोऽभवत् । सुदुर्लभं वरं लब्ध्वा प्राप्य राज्यं त्रिविष्टपे ।। १० ।। धर्मात्मा सततं भूत्वा कामात्मा समपद्यत । धर्मको आगे रखकर उस समय राजा नहुष सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति हो गये। वे परम दुर्लभ वर पाकर स्वर्गके राज्यको हस्तगत करके निरन्तर धर्मपरायण रहते हुए भी कामभोगमें आसक्त हो गये ।। १० १/२ ।। देवोद्यानेषु सर्वेषु नन्दनोपवनेषु च ।। ११ ।। कैलासे हिमवत्पृष्ठे मन्दरे श्वेतपर्वते । सह्ये महेन्द्रे मलये समुद्रेषु सरित्सु च ।। १२ ।। अप्सरोभिः परिवृतो देवकन्यासमावृतः । नहुषो देवराजोऽथ क्रीडन् बहुविधं तदा ।। १३ ।। शृण्वन् दिव्या बहुविधाः कथाः श्रुतिमनोहराः । वादित्राणि च सर्वाणि गीतं च मधुरस्वनम् ।। १४ ।। देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सह्य, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे ।। ११—१४ ।। विश्वावसुर्नारदश्च गन्धर्वाप्सरसां गणाः । ऋतवः षट् च देवेन्द्रं मूर्तिमन्त उपस्थिताः ।। १५ ।। विश्वावसु, नारद, गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय तथा छहों ऋतुएँ शरीर धारण करके देवेन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती थीं ।। १५ ।। मारुतः सुरभिर्वाति मनोज्ञः सुखशीतलः । एवं च क्रीडतस्तस्य नहुषस्य दुरात्मनः ।। १६ ।। सम्प्राप्ता दर्शनं देवी शक्रस्य महिषी प्रिया ।

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