भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1007, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1007

किया था॥ ६॥ द्रुमाद् रुक्मी महातेजा विजयं प्रत्यपद्यत। संछिद्य मौरवान् पाशान् निहत्य मुरमोजसा॥ ७॥ निर्जित्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले। षोडश स्त्रीसहस्राणि रत्नानि विविधानि च॥ ८॥ प्रतिपेदे हृषीकेशः शार्ङ्गं च धनुरुत्तमम्। महातेजस्वी रुक्मीने द्रुमसे विजय नामक धनुष पाया था। भगवान् श्रीकृष्णने अपने तेज और बलसे मुर दैत्यके पाशोंका उच्छेद करके भूमिपुत्र नरकासुरको जीतकर जब उसके यहाँसे अदितिके मणिमय कुण्डल वापस ले लिये और सोलह हजार स्त्रियों तथा नाना प्रकारके रत्नोंको अपने अधिकारमें कर लिया, उसी समय उन्हें शार्ङ्ग नामक उत्तम धनुष भी प्राप्त हुआ था॥ ७-८ १/२॥ रुक्मी तु विजयं लब्ध्वा धनुर्मेघनिभस्वनम्॥ ९॥ विभीषयन्निव जगत् पाण्डवानभ्यवर्तत। रुक्मी मेघकी गर्जनाके समान भयानक टंकार करनेवाले विजय नामक धनुषको पाकर सम्पूर्ण जगत्‌को भयभीत-सा करता हुआ पाण्डवोंके यहाँ आया॥ ९ १/२॥ नामृष्यत पुरा योऽसौ स्वबाहुबलगर्वितः॥ १०॥ रुक्मिण्या हरणं वीरो वासुदेवेन धीमता। यह वही वीर रुक्मी था, जो अपने बाहुबलके घमंडमें आकर पहले परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा किये गये रुक्मिणीके अपहरणको नहीं सह सका था॥ १० १/२॥ कृत्वा प्रतिज्ञां नाहत्वा निवर्तिष्ये जनार्दनम्॥ ११॥ ततोऽन्वधावद् वार्ष्णेयं सर्वशस्त्रभृतां वरः। वह सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था। उसने यह प्रतिज्ञा करके कि मैं वृष्णिवंशी श्रीकृष्णको मारे बिना अपने नगरको नहीं लौटूँगा, उनका पीछा किया था॥ ११ १/२॥ सेनया चतुरङ्गिण्या महत्या दूरपातया॥ १२॥ विचित्रायुधवर्मिण्या गङ्गयेव प्रवृद्धया। उस समय उसके साथ विचित्र आयुधों और कवचोंसे सुशोभित, दूरतकके लक्ष्यको मार गिरानेमें समर्थ तथा बढ़ी हुई गंगाके समान विशाल चतुरंगिणी सेना थी॥ १२ १/२॥ स समासाद्य वार्ष्णेयं योगानामीश्वरं प्रभुम्॥ १३॥ व्यंसितो व्रीडितो राजन् नाजगाम स कुण्डिनम्। राजन्! योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके पास पहुँचकर उनसे पराजित होनेके कारण लज्जित हो वह पुनः कुण्डिनपुरको नहीं लौटा॥ १३ १/२॥ यत्रैव कृष्णेन रणे निर्जितः परवीरहा॥ १४॥ तत्र भोजकटं नाम कृतं नगरमुत्तमम्।