भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1009

अपि द्रोणकृपौ वीरौ भीष्मकर्णावथो पुनः । अथवा सर्व एवैते तिष्ठन्तु वसुधाधिपाः ॥ २३ ॥ निहत्य समरे शत्रूंस्तव दास्यामि मेदिनीम् । ‘मेरे हिस्सेमें द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा वीरवर भीष्म एवं कर्ण ही क्यों न हों, किसीको जीवित नहीं छोड़ूँगा अथवा यहाँ पधारे हुए ये सब राजा चुपचाप खड़े रहें। मैं अकेला ही समरभूमिमें तुम्हारे सारे शत्रुओंका वध करके तुम्हें पृथ्वीका राज्य अर्पित कर दूँगा’ ॥ २३ १/२ ॥

इत्युक्तो धर्मराजस्य केशवस्य च संनिधौ ॥ २४ ॥ शृण्वतां पार्थिवेन्द्राणामन्येषां चैव सर्वशः । वासुदेवमभिप्रेक्ष्य धर्मराजं च पाण्डवम् ॥ २५ ॥ उवाच धीमान् कौन्तेयः प्रहस्य सखिपूर्वकम् । धर्मराज युधिष्ठिर तथा भगवान् श्रीकृष्णके समीप अन्य सब राजाओंके सुनते हुए रुक्मीके ऐसा कहनेपर परमबुद्धिमान् कुन्तीपुत्र अर्जुनने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखते हुए मित्रभावसे हँसकर कहा— ॥ २४-२५ १/२ ॥

कौरवाणां कुले जातः पाण्डोः पुत्रो विशेषतः ॥ २६ ॥ द्रोणं व्यपदिशञ्छिष्यो वासुदेवसहायवान् । भीतोऽस्मीति कथं ब्रूयां दधानो गाण्डिवं धनुः ॥ २७ ॥ ‘वीर! मैं कौरवोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। विशेषतः महाराज पाण्डुका पुत्र हूँ। आचार्य द्रोणको अपना गुरु कहता हूँ और स्वयं उनका शिष्य कहलाता हूँ। इसके सिवा साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हमारे सहायक हैं और मैं अपने हाथमें गाण्डीव धनुष धारण करता हूँ। ऐसी स्थितिमें मैं अपने-आपको डरा हुआ कैसे कह सकता हूँ? ॥ २६-२७ ॥

युध्यमानस्य मे वीर गन्धर्वैः सुमहाबलैः । सहायो घोषयात्रायां कस्तदाऽऽसीत् सखा मम ॥ २८ ॥ ‘वीरवर! कौरवोंकी घोषयात्राके समय जब मैंने महाबली गन्धर्वोंके साथ युद्ध किया था, उस समय कौन-सा मित्र मेरी सहायताके लिये आया था? ॥ २८ ॥

तथा प्रतिभये तस्मिन् देवदानवसंकुले । खाण्डवे युध्यमानस्य कः सहायस्तदाभवत् ॥ २९ ॥ ‘खाण्डववनमें देवताओं और दानवोंसे परिपूर्ण भयंकर युद्धमें जब मैं अपने प्रतिपक्षियोंके साथ युद्ध कर रहा था, उस समय मेरा कौन सहायक था? ॥ २९ ॥

निवातकवचैर्युद्धे कालकेयैश्च दानवैः । तत्र मे युध्यमानस्य कः सहायस्तदाभवत् ॥ ३० ॥ ‘जब निवातकवच तथा कालकेय नामक दानवोंके साथ छिड़े हुए युद्धमें मैं अकेला ही लड़ रहा था, उस समय मेरी सहायताके लिये कौन आया था? ॥ ३० ॥