महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1025, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रोणमासाद्य समरे ज्ञास्यसे हितमुत्तमम् । युध्यस्व ससुहृत् पापं कुरु कर्म सुदुष्करम् ॥ ७७ ॥ ‘समरभूमिमें द्रोणाचार्यके सामने जाकर ही तुम यह जान सकोगे कि तुम्हारा उत्तम हित किस बातमें है। आओ, अपने सुहृदोंके साथ रहकर युद्ध करो और गुरुके वधका अत्यन्त दुष्कर पाप कर डालो' ॥ ७७ ॥
शिखण्डिनमथो ब्रूहि उलूक वचनान्मम । स्त्रीति मत्वा महाबाहुर्न हनिष्यति कौरवः ॥ ७८ ॥ गाङ्गेयो धन्विनां श्रेष्ठो युद्ध्येदानीं सुनिर्भयः । कुरु कर्म रणे यत्तः पश्यामः पौरुषं तव ॥ ७९ ॥ ‘उलूक! इसके बाद तुम शिखण्डीसे भी मेरी यह बात कहना—‘धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ गंगापुत्र कुरुवंशी महाबाहु भीष्म तुम्हें स्त्री समझकर नहीं मारेंगे; इसलिये तुम अब निर्भय होकर युद्ध करना और समरभूमिमें यत्नपूर्वक पराक्रम प्रकट करना। हम तुम्हारा पुरुषार्थ देखेंगे' ॥ ७८-७९ ॥
एवमुक्त्वा ततो राजा प्रहस्योलूकमब्रवीत् । धनंजयं पुनर्ब्रूहि वासुदेवस्य शृण्वतः ॥ ८० ॥ ऐसा कहते-कहते राजा दुर्योधन खिलखिलाकर हँस पड़ा। तत्पश्चात् उलूकसे पुनः इस प्रकार बोला—‘उलूक! तुम वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके सामने ही अर्जुनसे पुनः इस प्रकार कहना— ॥ ८० ॥
अस्मान् वा त्वं पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् । अथवा निर्जितोऽस्माभी रणे वीर शयिष्यसि ॥ ८१ ॥ ‘वीर धनंजय! या तो तुम्हीं हमलोगोंको परास्त करके इस पृथ्वीका शासन करो या हमारे ही हाथोंसे मारे जाकर रणभूमिमें सदाके लिये सो जाओ ॥ ८१ ॥
राष्ट्रान्निर्वासनक्लेशं वनवासं च पाण्डव । कृष्णायाश्च परिक्लेशं संस्मरन् पुरुषो भव ॥ ८२ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! राज्यसे निर्वासित होने, वनमें निवास करने तथा द्रौपदीके अपमानित होनेके क्लेशोंको याद करके अब भी तो मर्द बनो ॥ ८२ ॥
यदर्थं क्षत्रिया सूते सर्वं तदिदमागतम् । बलं वीर्यं च शौर्यं च परं चाप्यस्त्रलाघवम् ॥ ८३ ॥ पौरुषं दर्शयन् युद्धे कोपस्य कुरु निष्कृतिम् । ‘क्षत्राणी जिसके लिये पुत्र पैदा करती है, वह सब प्रयोजन सिद्ध करनेका यह समय आ गया है। तुम युद्धमें बल, पराक्रम, उत्तम शौर्य, अस्त्र-संचालनकी फुर्ती और पुरुषार्थ दिखाते हुए अपने बड़े हुए क्रोधको (हमारे ऊपर प्रयोग करके) शान्त कर लो ॥ ८३ १/२ ॥
परिक्लिष्टस्य दीनस्य दीर्घकालोषितस्य च ।