महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1052, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'मूढ़ नराधम! भगवान् श्रीकृष्णके साथ मेरे कुपित होनेपर तू किस कारणसे जीवन तथा राज्यकी आशा करता है? ।। २० ।।
शान्ते भीष्मे तथा द्रोणे सूतपुत्रे च पातिते । निराशो जीविते राज्ये पुत्रेषु च भविष्यसि ॥ २१ ॥ 'भीष्म, द्रोणाचार्य तथा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर तू अपने जीवन, राज्य तथा पुत्रोंकी रक्षाकी ओरसे निराश हो जायगा ।। २१ ।।
भ्रातृणां निधनं श्रुत्वा पुत्राणां च सुयोधन । भीमसेनेन निहतो दुष्कृतानि स्मरिष्यसि ॥ २२ ॥ 'सुयोधन! तू अपने भाइयों और पुत्रोंका मरण सुनकर और भीमसेनके हाथसे स्वयं भी मारा जाकर अपने पापोंको याद करेगा ।। २२ ।।
न द्वितीयां प्रतिज्ञां हि प्रतिजानामि कैतव । सत्यं ब्रवीम्यहं ह्येतत् सर्वं सत्यं भविष्यति ॥ २३ ॥ युधिष्ठिरोऽपि कैतव्यमुलूकमिदमब्रवीत् । उलूक मद्द्वचो ब्रूहि गत्वा तात सुयोधनम् ॥ २४ ॥ 'शकुनिपुत्र! मैं दूसरी बार प्रतिज्ञा करना नहीं जानता। तुझसे सच्ची बात कहता हूँ। यह सब कुछ सत्य होकर रहेगा।' तत्पश्चात् युधिष्ठिरने भी धूर्त जुआरीके पुत्र उलूकसे इस प्रकार कहा—'वत्स उलूक! तू दुर्योधनके पास जाकर मेरी यह बात कहना— ।। २३-२४ ।।
स्वेन वृत्तेन मे वृत्तं नाधिगन्तुं त्वमर्हसि । उभयोरन्तरं वेद सूनृतानृतयोरपि ॥ २५ ॥ 'सुयोधन! तुझे अपने आचरणके अनुसार ही मेरे आचरणको नहीं समझना चाहिये। मैं दोनोंके बर्तावका तथा सत्य और झूठका भी अन्तर समझता हूँ ।। २५ ।।
न चाहं कामये पापमपि कीटपिपीलयोः । किं पुनर्जातिषु वधं कामयेयं कथंचन ॥ २६ ॥ 'मैं तो कीड़ों और चींटियोंको भी कष्ट पहुँचाना नहीं चाहता; फिर अपने भाई-बन्धुओं अथवा कुटुम्बी-जनोंके वधकी कामना किसी प्रकार भी कैसे कर सकता हूँ? ।। २६ ।।
एतदर्थं मया तात पञ्च ग्रामा वृताः पुरा । कथं तव सुदुर्बुद्धे न प्रेक्षे व्यसनं महत् ॥ २७ ॥ 'तात! इसीलिये पहले मैंने केवल पाँच ही गाँव माँगे थे। दुर्बुद्धे! मेरे ऐसा करनेका यही उद्देश्य था कि किसी तरह तेरे ऊपर महान् संकट आया हुआ न देखूँ ।। २७ ।।
स त्वं कामपरीतात्मा मूढभावाच्च कत्थसे । तथैव वासुदेवस्य न गृह्णासि हितं वचः ॥ २८ ॥