भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1079, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1079

‘तुम कौरवोंका सदा अहित करते हो; परंतु राजा दुर्योधन इस बातको नहीं समझते हैं। तुम मेरे गुणोंके प्रति द्वेष रखनेके कारण जिस प्रकार राजाओंकी मुझपर विरक्ति कराना चाहते हो, वैसा प्रयत्न तुम्हारे सिवा दूसरा कौन कर सकता है? इस समय युद्धका अवसर उपस्थित है और समान श्रेणीके उदारचरित राजा एकत्र हुए हैं; ऐसे अवसरपर आपसमें भेद (फूट) उत्पन्न करनेकी इच्छा रखकर कौन पुरुष अपने ही पक्षके योद्धाका इस प्रकार तेज और उत्साह नष्ट करेगा? ।। १४-१५ ।। न हायनैर्न पलितैर्न वित्तैर्न च बन्धुभिः । महारथत्वं संख्यातुं शक्यं क्षत्रस्य कौरव ।। १६ ।। ‘कौरव! केवल बड़ी अवस्था हो जाने, बाल पक जाने, अधिक धनका संग्रह कर लेने तथा बहुसंख्यक भाई-बन्धुओंके होनेसे ही किसी क्षत्रियको महारथी नहीं गिना जा सकता ।। १६ ।। बलज्येष्ठं स्मृतं क्षत्रं मन्त्रज्येष्ठा द्विजातयः । धनज्येष्ठाः स्मृता वैश्याः शूद्रास्तु वयसाधिकाः ।। १७ ।। ‘क्षत्रियजातिमें जो बलमें अधिक हो, वही श्रेष्ठ माना गया है। ब्राह्मण वेदमन्त्रोंके ज्ञानसे, वैश्य अधिक धनसे और शूद्र अधिक आयु होनेसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं ।। १७ ।। यथेच्छकं स्वयं ब्रूया रथानतिरथांस्तथा । कामद्वेषसमायुक्तो मोहात् प्रकुरुते भवान् ।। १८ ।। ‘तुम राग-द्वेषसे भरे हुए हो; अतः मोहवश मनमाने ढंगसे रथी-अतिरथियोंका विभाग कर रहे हो ।। दुर्योधन महाबाहो साधु सम्यगवेक्ष्यताम् । त्यज्यतां दुष्टभावोऽयं भीष्मः किल्बिषकृत् तव ।। १९ ।। ‘महाबाहु दुर्योधन! तुम अच्छी तरह विचार करके देख लो। ये भीष्म दुर्भावसे दूषित होकर तुम्हारी बुराई कर रहे हैं। तुम इन्हें अभी त्याग दो ।। १९ ।। भिन्ना हि सेना नृपते दुःसंधेया भवत्युत । मौला हि पुरुषव्याघ्र किमु नानासमुत्थिताः ।। २० ।। ‘नरेश्वर! पुरुषसिंह! एक बार सेनामें फूट पड़ जानेपर उसमें पुनः मेल कराना कठिन हो जाता है। उस दशामें मौलिक (पीढ़ियोंसे चले आनेवाले) सेवक भी हाथसे निकल जाते हैं। फिर जो भिन्न-भिन्न स्थानोंके लोग किसी एक कार्यके लिये उद्यत होकर एकत्र हुए हों, उनकी तो बात ही क्या है? ।। २० ।। एषां द्वैधं समुत्पन्नं योधानां युधि भारत । तेजोवधो नः क्रियते प्रत्यक्षेण विशेषतः ।। २१ ।। ‘भारत! इन योद्धाओंमें युद्धके अवसरपर दुविधा उत्पन्न हो गयी है। तुम प्रत्यक्ष देख रहे हो, हमारे तेज और उत्साहकी विशेषरूपसे हत्या की जा रही है ।। २१ ।।

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