भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1094

भरतनन्दन! महाराज! व्याघ्रदत्त और चन्द्रसेन—ये दो नरेश भी मेरे मतमें पाण्डवसेनाके श्रेष्ठ रथी हैं, इसमें संशय नहीं है ।। १९ ।। सेनाबिन्दुश्च राजेन्द्र क्रोधहन्ता च नामतः । यः समो वासुदेवेन भीमसेनेन वा विभो ।। २० ।। स योत्स्यति हि विक्रम्य समरे तव सैनिकैः । राजेन्द्र! राजा सेनाबिन्दुका दूसरा नाम क्रोधहन्ता भी है। प्रभो! वे भगवान् श्रीकृष्ण तथा भीमसेनके समान पराक्रमी माने जाते हैं। वे समरांगणमें तुम्हारे सैनिकोंके साथ पराक्रम प्रकट करते हुए युद्ध करेंगे ।। २० १/२ ।। मां च द्रोणं कृपं चैव यथा सम्मन्यते भवान् ।। २१ ।। तथा स समरश्लाघी मन्तव्यो रथसत्तमः । काश्यः परमशीघ्रास्त्रः श्लाघनीयो नरोत्तमः ।। २२ ।। तुम मुझको, आचार्य द्रोणको तथा कृपाचार्यको जैसा समझते हो, युद्धमें दूसरे वीरोंसे स्पर्धा रखनेवाले तथा बहुत ही फुर्तीके साथ अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले प्रशंसनीय एवं उत्तम रथी नरश्रेष्ठ काशिराजको भी तुम्हें वैसा ही मानना चाहिये ।। २१-२२ ।। रथ एकगुणो मह्यं ज्ञेयः परपुरंजयः । अयं च युधि विक्रान्तो मन्तव्योऽष्टगुणो रथः ।। २३ ।। मेरी दृष्टिमें शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले काशिराजको साधारण अवस्थामें एक रथी समझना चाहिये; परंतु जिस समय ये युद्धमें पराक्रम प्रकट करने लगते हैं उस समय इन्हें आठ रथियोंके बराबर मानना चाहिये ।। २३ ।। सत्यजित् समरश्लाघी द्रुपदस्यात्मजो युवा । गतः सोऽतिरथत्वं हि धृष्टद्युम्नेन सम्मितः ।। २४ ।। पाण्डवानां यशस्कामः परं कर्म करिष्यति । द्रुपदका तरुण पुत्र सत्यजित् सदा युद्धकी स्पृहा रखनेवाला है। वह धृष्टद्युम्नके समान ही अतिरथीका पद प्राप्त कर चुका है। वह पाण्डवोंके यशोविस्तारकी इच्छा रखकर युद्धमें महान् कर्म करेगा ।। २४ १/२ ।। अनुरक्तश्च शूरश्च रथोऽयमपरो महान् ।। २५ ।। पाण्ड्यराजो महावीर्यः पाण्डवानां धुरंधरः । दृढधन्वा महेष्वासः पाण्डवानां महारथः ।। २६ ।। पाण्डवपक्षके धुरंधर वीर महापराक्रमी पाण्ड्यराज भी एक अन्य महारथी हैं। ये पाण्डवोंके प्रति अनुराग रखनेवाले और शूरवीर हैं। इनका धनुष महान् और सुदृढ़ है। ये पाण्डवसेनाके सम्माननीय महारथी हैं ।। २५-२६ ।। श्रेणिमान् कौरवश्रेष्ठ वसुदानश्च पार्थिवः । उभावेतावतिरथौ मतौ परपुरंजयौ ।। २७ ।।