भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1117

स्वरमें इस प्रकार बोली—‘नानाजी! मैं आपकी आज्ञासे वहाँ अवश्य जाऊँगी ।। २७-२८ ।। अपि नामाद्य पश्येयमार्यं तं लोकविश्रुतम् । कथं च तीव्रं दुःखं मे नाशयिष्यति भार्गवः । एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं यथा यास्यामि तत्र वै ।। २९ ।। ‘परंतु मैं आज उन विश्वविख्यात श्रेष्ठ महात्माका दर्शन कैसे कर सकूँगी और वे भृगुनन्दन परशुरामजी मेरे इस दुःसह दुःखका नाश किस प्रकार करेंगे? मैं यह सब जानना चाहती हूँ, जिससे वहाँ जा सकूँ’ ।। २९ ।।

होत्रवाहन उवाच

रामं द्रक्ष्यसि भद्रे त्वं जामदग्न्यं महावने । उग्रे तपसि वर्तन्तं सत्यसंधं महाबलम् ।। ३० ।। **होत्रवाहन बोले—**भद्रे! जमदग्निनन्दन परशुराम एक महान् वनमें उग्र तपस्या कर रहे हैं। वे महान् शक्तिशाली और सत्यप्रतिज्ञ हैं। तुझे अवश्य ही उनका दर्शन प्राप्त होगा ।। ३० ।।

महेन्द्रं वै गिरिश्रेष्ठं रामो नित्यमुपास्ति ह । ऋषयो वेदविद्वांसो गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।। ३१ ।। परशुरामजी सदा पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्रपर रहा करते हैं। वहाँ वेदवेत्ता महर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराओंका भी निवास है ।। ३१ ।।

तत्र गच्छस्व भद्रं ते ब्रूयाश्चैनं वचो मम । अभिवाद्य च तं मूर्ध्ना तपोवृद्धं दृढव्रतम् ।। ३२ ।। बेटी! तेरा कल्याण हो। तू वहीं जा और उन दृढ़व्रती तपोवृद्ध महात्माको अभिवादन करके पहले उनसे मेरी बात कहना ।। ३२ ।।

ब्रूयाश्चैनं पुनर्भद्रे यत् ते कार्यं मनीषितम् । मयि संकीर्तिते रामः सर्वं तत् ते करिष्यति ।। ३३ ।। भद्रे! तत्पश्चात् तेरे मनमें जो अभीष्ट कार्य है वह सब उनसे निवेदन करना। मेरा नाम लेनेपर परशुरामजी तेरा सब कार्य करेंगे ।। ३३ ।।

मम रामः सखा वत्से प्रीतियुक्तः सुहृच्च मे । जमदग्निसुतो वीरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।। ३४ ।। वत्से! सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ जमदग्निनन्दन वीरवर परशुराम मेरे सखा और प्रेमी सुहृद् हैं ।। ३४ ।।

एवं ब्रुवति कन्यां तु पार्थिवे होत्रवाहने । अकृतव्रणः प्रादुरासीद् रामस्यानुचरः प्रियः ।। ३५ ।।