भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1123

भीष्मे वा कुरुशार्दूले शाल्वराजेऽथवा पुनः । उभयोरेव वा ब्रह्मन् युक्तं यत् तत् समाचर ॥ ७ ॥ ब्रह्मन्! कुरुश्रेष्ठ भीष्मके साथ अथवा शाल्वराजके साथ अथवा दोनोंके ही साथ जो उचित बर्ताव हो, वह करें ॥ ७ ॥ निवेदितं मया ह्येतद् दुःखमूलं यथातथम् । विधानं तत्र भगवन् कर्तुमर्हसि युक्तितः ॥ ८ ॥ मैंने अपने दुःखके इस मूल कारणको यथार्थरूपसे निवेदन कर दिया। भगवन्! अब आप अपनी युक्तिसे ही इस विषयमें न्यायोचित कार्य करें ॥ ८ ॥

अकृतव्रण उवाच

उपपन्नमिदं भद्रे यदेवं वरवर्णिनि । धर्मं प्रति वचो ब्रूयाः शृणु चेदं वचो मम ॥ ९ ॥ अकृतव्रण बोले—भद्रे! तुम जो इस प्रकार धर्मानुकूल बात कहती हो, यही तुम्हारे लिये उचित है। वरवर्णिनि! अब मेरी यह बात सुनो ॥ ९ ॥ यदि त्वामापगेयो वै न नयेद् गजसाह्वयम् । शाल्वस्त्वां शिरसा भीरु गृह्णीयाद् रामचोदितः ॥ १० ॥ भीरु! यदि गङ्गानन्दन भीष्म तुम्हें हस्तिनापुर न ले जाते तो राजा शास्त्र परशुरामजीके कहनेपर तुम्हें आदरपूर्वक स्वीकार कर लेता ॥ १० ॥ तेन त्वं निर्जिता भद्रे यस्मान्नीतासि भाविनि । संशयः शाल्वराजस्य तेन त्वयि सुमध्यमे ॥ ११ ॥ परंतु भद्रे! भीष्म तुम्हें जीतकर अपने साथ ले गये। भाविनि! सुमध्यमे! यही कारण है कि शाल्वराजके मनमें तुम्हारे प्रति संशय उत्पन्न हो गया है ॥ ११ ॥ भीष्मः पुरुषमानी च जितकाशी तथैव च । तस्मात् प्रतिक्रिया युक्ता भीष्मे कारयितुं तव ॥ १२ ॥ भीष्मको अपने पुरुषार्थका अभिमान है और वे इस समय अपनी विजयसे उल्लसित हो रहे हैं। अतः भीष्मसे ही बदला लेना तुम्हारे लिये उचित होगा ॥ १२ ॥

अम्बोवाच

ममाप्येष सदा ब्रह्मन् हृदि कामोऽभिवर्तते । घातयेयं यदि रणे भीष्ममित्येव नित्यदा ॥ १३ ॥ भीष्मं वा शाल्वराजं वा यं वा दोषेण गच्छसि । प्रशाधि तं महाबाहो यत्कृतेऽहं सुदुःखिता ॥ १४ ॥ अम्बा बोली—ब्रह्मन्! मेरे मनमें भी सदा यह इच्छा बनी रहती है कि मैं युद्धमें भीष्मका वध करा दूँ। महाबाहो! आप भीष्मको या शाल्वराजको जिसे भी दोषी समझते