महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसकृच्चाब्रुवं राजन् शोकवेगपरिप्लुतः । अहो बत कृतं पापं मयेदं क्षत्रधर्मणा ॥ ३७ ॥ गुरुर्द्विजातिर्धर्मात्मा यदेवं पीडितः शरैः । राजन्! उस समय शोकके वेगसे व्याकुल हो मैं बार-बार इस प्रकार कहने लगा—'अहो! मुझ क्षत्रियने यह बड़ा भारी पाप कर डाला, जो कि धर्मात्मा एवं ब्राह्मण गुरुको इस प्रकार बाणोंसे पीड़ित किया' ॥ ३७ १/२ ॥ ततो न प्राहरं भूयो जामदग्न्याय भारत ॥ ३८ ॥ अथावताप्य पृथिवीं पूषा दिवससंक्षये । जगामास्तं सहस्रांशुस्ततो युद्धमुपारमत् ॥ ३९ ॥ भारत! उसके बादसे मैंने परशुरामजीपर फिर प्रहार नहीं किया। इधर सहस्र किरणोंवाले भगवान् सूर्य इस पृथ्वीको तपाकर दिनका अन्त होनेपर अस्त हो गये; इसलिये वह युद्ध बंद हो गया ॥ ३८-३९ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम और भीष्मका युद्धविषयक एक सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७९ ॥