महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1157, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाणैर्दिव्यैर्जामदग्न्यस्य संख्ये दिव्यान्श्वानभ्यवर्षं ससूतान् ॥ ११ ॥ नरेन्द्र! उन भयंकर शक्तियोंको भी मैंने ढालसे रोककर तलवारसे रणभूमिमें काट गिराया। तत्पश्चात् परशुरामजीके दिव्य घोड़ों तथा सारथिपर मैंने दिव्य बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ११ ॥
निर्मुक्तानां पन्नगानां सरूपा दृष्ट्वा शक्तीर्हेमचित्रा निकृत्ताः । प्रादुश्चक्रे दिव्यमस्त्रं महात्मा क्रोधाविष्टो हैहयेशप्रमाथी ॥ १२ ॥ केंचुलीसे छूटकर निकले हुए सर्पोंके समान आकृतिवाली उन सुवर्णजटित विचित्र शक्तियोंको कटी हुई देख हैहयराजका विनाश करनेवाले महात्मा परशुरामजीने कुपित होकर पुनः अपना दिव्य अस्त्र प्रकट किया ॥ १२ ॥
ततः श्रेण्यः शलभानामिवोग्राः समापेतुर्विशिखानां प्रदीप्ताः । समाचिनोच्चापि भृशं शरीरं हयान् सूतं सरथं चैव मह्यम् ॥ १३ ॥ फिर तो टिड्डियोंकी पंक्तियोंके समान प्रज्वलित एवं भयंकर बाणोंके समूह प्रकट होने लगे। इस प्रकार उन्होंने मेरे शरीर, रथ, सारथि और घोड़ोंको सर्वथा आच्छादित कर दिया ॥ १३ ॥
रथः शरैर्मे निचितः सर्वतोऽभूत् तथा वाहाः सारथिश्चैव राजन् । युगं रथेषां च तथैव चक्रे तथैवाक्षः शरकृत्तोऽथ भग्नः ॥ १४ ॥ राजन्! मेरा रथ चारों ओरसे उनके बाणोंद्वारा व्याप्त हो रहा था। घोड़ों और सारथिकी भी यही दशा थी। युग तथा ईषादण्डको भी उन्होंने उसी प्रकार बाणविद्ध कर रखा था और रथका धुरा उनके बाणोंसे कटकर टूक-टूक हो गया था ॥ १४ ॥
ततस्तस्मिन् बाणवर्षे व्यतीते शरोघेण प्रत्यवर्षं गुरुं तम् । स विक्षतो मार्गणैर्ब्रह्मराशि- र्देहादसक्तं मुमुचे भूरि रक्तम् ॥ १५ ॥ जब उनकी बाण-वर्षा समाप्त हुई, तब मैंने भी बदलेमें गुरुदेवपर बाणसमूहोंकी बौछार आरम्भ कर दी। वे ब्रह्मराशि महात्मा मेरे बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर अपने शरीरसे अधिकाधिक रक्तकी धारा बहाने लगे ॥ १५ ॥