भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1160, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1160

स मे भुजान्तरे राजन् निपत्य रुधिराशनः । मयैव सह राजेन्द्र जगाम वसुधातलम् ॥ ८ ॥ राजेन्द्र! वह रक्त पीनेवाला बाण मेरी दोनों भुजाओंके बीच (वक्षःस्थलमें) चोट पहुँचाकर मुझे साथ लिये-दिये पृथ्वीपर जा गिरा ॥ ८ ॥ मत्वा तु निहतं रामस्ततो मां भरतर्षभ । मेघवद् विननादोच्चैर्जहृषे च पुनः पुनः ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय मुझे मारा गया जानकर परशुरामजी मेघके समान गम्भीर स्वरसे गर्जना करने लगे। उनके शरीरमें बार-बार हर्षजनित रोमांच होने लगा ॥ ९ ॥ तथा तु पतिते राजन् मयि रामो मुदा युतः । उदक्रोशन्महानादं सह तैरनुयायिभिः ॥ १० ॥ राजन्! इस प्रकार मेरे धराशायी होनेपर परशुरामजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने अनुयायियोंके साथ महान् कोलाहल मचाया ॥ १० ॥ मम तत्राभवन् ये तु कुरवः पार्श्वतः स्थिताः । आगता अपि युद्धं तज्जनास्तत्र दिदृक्षवः । आर्तिं परमिकां जग्मुस्ते तदा पतिते मयि ॥ ११ ॥ वहाँ मेरे पार्श्वभागमें जो कुरुवंशी क्षत्रियगण खड़े थे तथा जो लोग वहाँ युद्ध देखनेकी इच्छासे आये थे, उन सबको मेरे गिर जानेपर बड़ा दुःख हुआ ॥ ११ ॥ ततोऽपश्यं पतितो राजसिंहं द्विजानष्टौ सूर्यहुताशनाभान् । ते मां समन्तात् परिवार्य तस्थुः स्वबाहुभिः परिधार्याजिमध्ये ॥ १२ ॥ राजसिंह! वहाँ गिरते समय मैंने देखा कि सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी आठ ब्राह्मण आये और संग्रामभूमिमें मुझे सब ओरसे घेरकर अपनी भुजाओंपर ही मेरे शरीरको धारण करके खड़े हो गये ॥ १२ ॥ रक्ष्यमाणश्च तैर्विप्रैर्नाहं भूमिमुपास्पृशम् । अन्तरिक्षे धृतो ह्यस्मि तैर्विप्रैर्बान्धवैरिव ॥ १३ ॥ उन ब्राह्मणोंसे सुरक्षित होनेके कारण मुझे धरतीका स्पर्श नहीं करना पड़ा। मेरे सगे भाई-बन्धुओंकी भाँति उन ब्राह्मणोंने मुझे आकाशमें ही रोक लिया था ॥ १३ ॥ श्वसन्निवान्तरिक्षे च जलबिन्दुभिरुक्षितः । ततस्ते ब्राह्मणा राजन्नब्रुवन् परिगृह्य माम् ॥ १४ ॥ राजन्! आकाशमें मैं साँस लेता-सा ठहर गया था। उस समय ब्राह्मणोंने मुझपर जलकी बूँदें छिड़क दीं। फिर वे मुझे पकड़कर बोले ॥ १४ ॥ मा भैरिति समं सर्वे स्वस्ति तेऽस्त्विति चासकृत् ।