भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1181

इस प्रकार बारह वर्षोंतक कठोर तपस्यामें संलग्न हो उसने पृथ्वी और आकाशको संतप्त कर दिया। उसके जातिवालोंने आकर उसे उस कठोर व्रतसे निवृत्त करनेकी चेष्टा की; परंतु उन्हें सफलता न मिल सकी ॥ २३ ॥ ततोऽगमद् वत्सभूमिं सिद्धचारणसेविताम् । आश्रमं पुण्यशीलानां तापसानां महात्मनाम् ॥ २४ ॥ तत्र पुण्येषु तीर्थेषु साऽऽप्लुताङ्गी दिवानिशम् । व्यचरत् काशिकन्या सा यथाकामविचारिणी ॥ २५ ॥ तदनन्तर वह सिद्धों और चारणोंद्वारा सेवित वत्सदेशकी भूमिमें गयी और वहाँ पुण्यशील तपस्वी महात्माओंके आश्रमोंमें विचरने लगी। काशिराजकी वह कन्या दिन-रात वहाँके पुण्य तीर्थोंमें स्नान करती और अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र विचरती रहती थी ॥ नन्दाश्रमे महाराज तथोलूकाश्रमे शुभे । चवनस्याश्रमे चैव ब्रह्मणः स्थान एव च ॥ २६ ॥ प्रयागे देवयजने देवारण्येषु चैव ह । भोगवत्यां महाराज कौशिकस्याश्रमे तथा ॥ २७ ॥ माण्डव्याश्रमे राजन् दिलीपस्याश्रमे तथा । रामह्रदे च कौरव्य पैलगर्गस्य चाश्रमे ॥ २८ ॥ एतेषु तीर्थेषु तदा काशिकन्या विशाम्पते । आप्लावयत गात्राणि व्रतमास्थाय दुष्करम् ॥ २९ ॥ महाराज! शुभकारक नन्दाश्रम, उलूकाश्रम, च्यवनाश्रम, ब्रह्मस्थान, देवताओंके यज्ञस्थान प्रयाग, देवारण्य, भोगवती, कौशिकाश्रम, माण्डव्याश्रम, दिलीपाश्रम, रामह्रद और पैलगर्गाश्रम—क्रमशः इन सभी तीर्थोंमें उन दिनों काशिराजकी कन्याने कठोर व्रतका आश्रय ले स्नान किया ॥ २६—२९ ॥ तामब्रवीच्च कौरव्य मम माता जले स्थिता । किमर्थं क्लिश्यसे भद्रे तथ्यमेव वदस्व मे ॥ ३० ॥ कुरुनन्दन! उस समय मेरी माता गंगाने जलमें प्रकट होकर अम्बासे कहा—'भद्रे! तू किसलिये शरीरको इतना क्लेश देती है। मुझे ठीक-ठीक बता' ॥ सैनामथाब्रवीद् राजन् कृताञ्जलिरनिन्दिता । भीष्मेण समरे रामो निर्जितश्चारुलोचने ॥ ३१ ॥ कोऽन्यस्तमुत्सहेज्जेतुमुद्यतेषुं महीपतिः । साहं भीष्मविनाशाय तपस्तप्स्ये सुदारुणम् ॥ ३२ ॥ राजन्! तब साध्वी अम्बाने हाथ जोड़कर गंगाजीसे कहा—'चारुलोचने! भीष्मने युद्धमें परशुरामजीको परास्त कर दिया; फिर दूसरा कौन ऐसा राजा है, जो धनुष-बाण