महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1208, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंधूपकी सुगन्ध फैली हुई थी। अनेकानेक ध्वज और पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। वहाँ भक्ष्य, भोज्य, पेय आदि सभी वस्तुएँ, जिनका दन्त और जिह्वाद्वारा उदराग्निमें हवन किया जाता है, प्रस्तुत थीं। तत्पश्चात् कुबेरने उस भवनमें प्रवेश किया ॥ ३४-३५ ॥ तत् स्थानं तस्य दृष्ट्वा तु सर्वतः समलंकृतम् । मणिरत्नसुवर्णानां मालाभिः परिपूरितम् ॥ ३६ ॥ नानाकुसुमगन्धाढ्यं सिक्तसम्मृष्टशोभितम् । अथाब्रवीद् यक्षपतिस्तान् यक्षाननुगांस्तदा ॥ ३७ ॥ स्वलंकृतमिदं वेश्म स्थूणस्यामितविक्रमाः । नोपसर्पति मां चैव कस्मादद्य स मन्दधीः ॥ ३८ ॥ कुबेरने उसके निवासस्थानको सब ओरसे सुसज्जित, मणि, रत्न तथा सुवर्णकी मालाओंसे परिपूर्ण, भाँति-भाँतिके पुष्पोंकी सुगन्धसे व्याप्त तथा झाड़-बुहार और धो-पोंछ देनेके कारण शोभासम्पन्न देखकर यक्षराजने स्थूणाकर्णके सेवकोंसे पूछा—‘अमित पराक्रमी यक्षो! स्थूणाकर्णका यह भवन तो सब प्रकारसे सजाया हुआ दिखायी देता है (इससे सिद्ध है कि वह घरमें ही है), तथापि वह मूर्ख मेरे पास आता क्यों नहीं है? ॥ यस्माज्जानन् स मन्दात्मा मामसौ नोपसर्पति । तस्मात् तस्मै महादण्डो धार्यः स्यादिति मे मतिः ॥ ३९ ॥ ‘वह मन्दबुद्धि यक्ष मुझे आया हुआ जानकर भी मेरे निकट नहीं आ रहा है; इसलिये उसे महान् दण्ड देना चाहिये, ऐसा मेरा विचार है’ ॥ ३९ ॥
यक्षा ऊचुः द्रुपदस्य सुता राजन् राज्ञो जाता शिखण्डिनी । तस्या निमित्ते कस्मिंश्चित् प्रादात् पुरुषलक्षणम् ॥ ४० ॥ अग्रहील्लक्षणं स्त्रीणां स्त्रीभूतो तिष्ठते गृहे । नोपसर्पति तेनासौ सव्रीडः स्त्रीस्वरूपवान् ॥ ४१ ॥ यक्षोंने कहा—राजन्! राजा द्रुपदके यहाँ एक शिखण्डिनी नामकी कन्या उत्पन्न हुई है। उसीको किसी विशेष कारणवश इन्होंने अपना पुरुषत्व दे दिया है और उसका स्त्रीत्व स्वयं ग्रहण कर लिया है। तबसे वे स्त्रीरूप होकर घरमें ही रहते हैं। स्त्रीरूपमें होनेके कारण ही वे लज्जावश आपके पास नहीं आ रहे हैं ॥ एतस्मात् कारणाद् राजन् स्थूणो न त्वाद्य सर्पति । श्रुत्वा कुरु यथान्यायं विमानमिह तिष्ठताम् ॥ ४२ ॥ महाराज! इसी कारणसे स्थूणाकर्ण आज आपके सामने नहीं उपस्थित हो रहे हैं। यह सुनकर आप जैसा उचित समझें, करें। आज आपका विमान यहीं रहना चाहिये ॥ आनीयतां स्थूण इति ततो यक्षाधिपोऽब्रवीत् ।