भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 123

तस्माच्च भगवान् देवः स्वयमेव हुताशनः । स्त्रीवेषमद्भुतं कृत्वा तत्रैवान्तरधीयत ।। २९ ।।

उस हवनकुण्डसे साक्षात् भगवान् अग्निदेव प्रकट होकर अद्भुत स्त्रीवेष धारण करके वहीं अन्तर्धान हो गये ।। २९ ।।

स दिशः प्रदिशश्चैव पर्वतानि वनानि च । पृथिवीं चान्तरिक्षं च विचिन्त्याथ मनोगतिः । निमेषान्तरमात्रेण बृहस्पतिमुपागमत् ।। ३० ।।

मनके समान तीव्र गतिवाले अग्निदेव सम्पूर्ण दिशाओं, विदिशाओं, पर्वतों और वनोंमें तथा भूतल और आकाशमें भी इन्द्रकी खोज करके पलभरमें बृहस्पतिके पास लौट आये ।। ३० ।।

अग्निरुवाच

बृहस्पते न पश्यामि देवराजमिह क्वचित् । आपः शेषताः सदा चापः प्रवेष्टुं नोत्सहाम्यहम् ।। ३१ ।।