महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1244, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंचारों ओर धूलकी वर्षा होनेसे सम्पूर्ण दिशाएँ शोभाहीन हो गयी हैं। उत्पातसूचक भयंकर मेघ रातमें रक्तकी वर्षा करते हैं ।। २९ ।। कृत्तिकां पीडयंस्तीक्ष्णैर्नक्षत्रं पृथिवीपते । अभीक्ष्णवाता वायन्ते धूमकेतुमवस्थिताः ।। ३० ।। राजन्! अपने तीक्ष्ण (क्रूरतापूर्ण) कर्मोंके द्वारा उपलक्षित होनेवाला राहु (चित्रा और स्वातीके बीचमें रहकर सर्वतोभद्रचक्रगतवेधके अनुसार) कृत्तिका नक्षत्रको पीड़ा दे रहा है। बारंबार धूमकेतुका आश्रय लेकर प्रचण्ड आँधी उठती रहती है ।। ३० ।। विषमं जनयन्त्येत आक्रन्दजननं महत् । त्रिषु सर्वेषु नक्षत्रनक्षत्रेषु विशाम्पते । गृध्रः सम्पतते शीर्षं जनयन् भयमुत्तमम् ।। ३१ ।। वह महान् युद्ध एवं विषम परिस्थिति पैदा करनेवाली है। राजन्! (अश्विनी आदि नक्षत्रोंको तीन भागोंमें बाँटनेपर जो नौ-नौ नक्षत्रोंके तीन समुदाय होते हैं, वे क्रमशः अश्वपति, गजपति तथा नरपतिके छत्र कहलाते हैं; ये ही पापग्रहसे आक्रान्त होनेपर क्षत्रियोंका विनाश सूचित करनेके कारण ‘नक्षत्र-नक्षत्र’ कहे गये हैं) इन तीनों अथवा सम्पूर्ण नक्षत्र-नक्षत्रोंमें शीर्षस्थानपर यदि पापग्रहसे वेध हो तो वह ग्रह महान् भय उत्पन्न करनेवाला होता है; इस समय ऐसा ही कुयोग आया है ।। ३१ ।। चतुर्दशीं पञ्चदशीं भूतपूर्वां च षोडशीम् । इमां तु नाभिजानेऽहममावास्यां त्रयोदशीम् । चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीम् ।। ३२ ।। एक तिथिका क्षय होनेपर चौदहवें दिन, तिथिक्षय न होनेपर पंद्रहवें दिन और एक तिथिकी वृद्धि होनेपर सोलहवें दिन अमावास्याका होना तो पहले देखा गया है; परंतु इस पक्षमें जो तेरहवें दिन यह अमावास्या आ गयी है, ऐसा पहले भी कभी हुआ है, इसका स्मरण मुझे नहीं है। इस एक ही महीनेमें तेरह दिनोंके भीतर चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों लग गये ।। ३२ ।। अपर्वणि ग्रहेणैतौ प्रजाः संक्षपयिष्यतः । मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्णचतुर्दशीम् । शोणितैर्वक्त्रसम्पूर्णा अतृप्तास्तत्र राक्षसाः ।। ३३ ।। इस प्रकार अप्रसिद्ध पर्वमें ग्रहण लगनेके कारण ये सूर्य और चन्द्रमा प्रजाका विनाश करनेवाले होंगे। कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको बड़े जोरसे मांसकी वर्षा हुई थी। उस समय राक्षसोंका मुँह रक्तसे भरा हुआ था। वे खून पीते अघाते नहीं थे ।। ३३ ।। प्रतिस्रोतो महानद्यः सरितः शोणितोदकाः । फेनायमानाः कूपाश्च कूर्दन्ति वृषभा इव ।। ३४ ।।