महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभागने लगते हैं ॥ ७८ ॥ भीतान् भग्नांश्च सम्प्रेक्ष्य भयं भूयोऽभिवर्धते । प्रभग्ना सहसा राजन् दिशो विद्रवते चमूः ॥ ७९ ॥ राजन्! भयभीत होकर भागते हुए सैनिकोंको देखकर अन्य योद्धाओंका भय, बहुत अधिक बढ़ जाता है; फिर तो सहसा सारी सेना हतोत्साह होकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगती है ॥ ७९ ॥ नैव स्थापयितुं शक्या शूरैरपि महाचमूः । सत्कृत्य महतीं सेनां चतुरङ्गां महीपतिः । उपायपूर्वं मेधावी यतेत सततोत्थितः ॥ ८० ॥ उस समय बहुत-से शूरवीर भी उस विशाल वाहिनीको रोककर खड़ी नहीं रख सकते। इसलिये बुद्धिमान् राजाको चाहिये कि वह सतत सावधान रहकर कोई-न-कोई उपाय करके अपनी विशाल चतुरंगिणी सेनाको विशेष सत्कारपूर्वक स्थिर रखनेका यत्न करे ॥ ८० ॥ उपायविजयं श्रेष्ठमाहुर्भेदेन मध्यमम् । जघन्य एष विजयो यो युद्धेन विशाम्पते ॥ ८१ ॥ राजन्! साम-दानरूप उपायसे जो विजय प्राप्त होती है, उसे श्रेष्ठ बताया गया है। भेदनीतिके द्वारा शत्रुसेनामें फूट डालकर जो विजय प्राप्त की जाती है, वह मध्यम है तथा युद्धके द्वारा मार-काट मचाकर जो शत्रुको पराजित किया जाता है, वह सबसे निम्नश्रेणीकी विजय है ॥ ८१ ॥ महादोषः संनिपातस्तस्याद्यः क्षय उच्यते । परस्परज्ञाः संहृष्टा व्यवधूताः सुनिश्चिताः ॥ ८२ ॥ पञ्चाशदपि ये शूरा मृद्गन्ति महतीं चमूम् । अपि वा पञ्च षट् सप्त विजयन्त्यनिवर्तिनः ॥ ८३ ॥ युद्ध महान् दोषका भण्डार है। उन दोषोंमें सबसे प्रधान है जनसंहार। यदि एक दूसरेको जाननेवाले, हर्ष और उत्साहमें भरे रहनेवाले, कहीं भी आसक्त न होकर विजय-प्राप्तिका दृढ़ निश्चय रखनेवाले तथा शौर्यसम्पन्न पचास सैनिक भी हों तो वे बड़ी भारी सेनाको धूलमें मिला देते हैं। यदि पीछे पैर न हटानेवाले पाँच, छः और सात ही योद्धा हों तो वे भी निश्चितरूपसे विजयी होते हैं ॥ ८२-८३ ॥ न वैनतेयो गरुडः प्रशंसति महाजनम् । दृष्ट्वा सुपर्णोऽपचितिं महत्या अपि भारत ॥ ८४ ॥ भारत! सुन्दर पंखोंवाले विनतानन्दन गरुड़ विशाल सेनाका भी विनाश होता देखकर अधिक जनसमूहकी प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ ८४ ॥ न बाहुल्येन सेनाया जयो भवति नित्यशः ।