महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1258, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुण है ॥ ६ ॥ एते पञ्च गुणा राजन् महाभूतेषु पञ्चसु । वर्तन्ते सर्वलोकेषु येषु भूताः प्रतिष्ठिताः ॥ ७ ॥ राजन्! ये पाँच गुण सम्पूर्ण लोकोंके आश्रय-भूत पंचमहाभूतोंमें रहते हैं। जिनमें समस्त प्राणी प्रतिष्ठित हैं ॥ ७ ॥ अन्योन्यं नाभिवर्तन्ते साम्यं भवति वै यदा ॥ ८ ॥ ये पाँचों गुण जब साम्यावस्थामें रहते हैं, तब एक-दूसरेसे संयुक्त नहीं होते हैं ॥ ८ ॥ यदा तु विषमीभावमाविशन्ति परस्परम् । तदा देहैर्देहवन्तो व्यतिरोहन्ति नान्यथा ॥ ९ ॥ जब ये विषमभावको प्राप्त होते हैं, तब एक-दूसरेसे मिल जाते हैं। उस समय ही देहधारी प्राणी अपने शरीरोंसे संयुक्त होते हैं, अन्यथा नहीं ॥ ९ ॥ आनुपूर्व्या विनश्यन्ति जायन्ते चानुपूर्वशः । सर्वाण्यपरिमेयाणि तदेषां रूपमैश्वरम् ॥ १० ॥ ये सब भूत क्रमसे नष्ट होते और क्रमसे ही उत्पन्न होते हैं (पृथ्वी आदिके क्रमसे इनका लय होता है और आकाश आदिके क्रमसे इनका प्रादुर्भाव)। ये सब अपरिमेय हैं। इनका रूप ईश्वरकृत है ॥ १० ॥ तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः । तेषां मनुष्यास्तर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते ॥ ११ ॥ भिन्न-भिन्न लोकोंमें पांचभौतिक धातु दृष्टिगोचर होते हैं। मनुष्य तर्कके द्वारा उनके प्रमाणोंका प्रतिपादन करते हैं ॥ ११ ॥ अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् । प्रकृतिभ्यः परं यत् तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥ परंतु जो अचिन्त्य भाव हैं, उन्हें तर्कसे सिद्ध करनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये। जो प्रकृतिसे परे है, वही अचिन्त्यस्वरूप है ॥ १२ ॥ सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन । परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः ॥ १३ ॥ कुरुनन्दन! अब मैं सुदर्शन नामक द्वीपका वर्णन करूँगा। महाराज! वह द्वीप चक्रकी भाँति गोलाकार स्थित है ॥ १३ ॥ नदीजलप्रतिच्छन्नः पर्वतैश्चाभ्रसंनिभैः । पुरैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा ॥ १४ ॥ वृक्षैः पुष्पफलोपेतैः सम्पन्नधनधान्यवान् । लवणेन समुद्रेण समन्तात् परिवारितः ॥ १५ ॥