महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1261, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरनेवाला शृंगवान् पर्वत। राजन्! ये छः पर्वत सिद्धों तथा चारणोंके निवास स्थान हैं॥ ४-५॥ एषामन्तरविष्कम्भो योजनानि सहस्रशः। तत्र पुण्या जनपदास्तानि वर्षाणि भारत॥ ६॥ भरतनन्दन! इनके बीचका विस्तार सहस्रों योजन है। वहाँ भिन्न-भिन्न वर्ष (खण्ड) हैं और उनमें बहुत-से पवित्र जनपद हैं॥ ६॥ वसन्ति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः। इदं तु भारतं वर्षं ततो हैमवतं परम्॥ ७॥ उनमें सब ओर नाना जातियोंके प्राणी निवास करते हैं, उनमेंसे यह भारतवर्ष है। इसके बाद हिमालयसे उत्तर हैमवतवर्ष है॥ ७॥ हेमकूटात् परं चैव हरिवर्षं प्रचक्षते। दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ ८॥ प्रागायतो महाभाग माल्यवान् नाम पर्वत:। ततः परं माल्यवतः पर्वतो गन्धमादनः॥ ९॥ हेमकूट पर्वतसे आगे हरिवर्षकी स्थिति बतायी जाती है। महाभाग! नीलगिरिके दक्षिण और निषधपर्वतके उत्तर पूर्वसे पश्चिमकी ओर फैला हुआ माल्यवान् नामक पर्वत है। माल्यवान्से आगे गन्धमादन पर्वत है॥ ८-९॥ परिमण्डलस्तयोर्मध्ये मेरुः कनकपर्वतः। आदित्यतरुणाभासो विधूम इव पावकः॥ १०॥ इन दोनोंके बीचमें मण्डलाकार सुवर्णमय मेरुपर्वत है, जो प्रातःकालके सूर्यके समान प्रकाशमान तथा धूमरहित अग्निके समान कान्तिमान् है॥ १०॥ योजनानां सहस्राणि चतुरशीतिरुच्छ्रितः। अधस्ताच्चतुरशीतिर्योजनानां महीपते॥ ११॥ उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। राजन्! वह नीचे भी चौरासी हजार योजनतक पृथ्वीके भीतर घुसा हुआ है॥ ११॥ ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक् च लोकानावृत्य तिष्ठति। तस्य पार्श्वेष्वमी द्वीपाश्चत्वारः संस्थिता विभो॥ १२॥ प्रभो! मेरुपर्वत ऊपर-नीचे तथा अगल-बगल सम्पूर्ण लोकोंको आवृत करके खड़ा है। उसके पार्श्वभागमें ये चार द्वीप बसे हुए हैं॥ १२॥ भद्राश्वः केतुमालश्च जम्बूद्वीपश्च भारत। उत्तराश्चैव कुरवः कृतपुण्यप्रतिश्रयाः॥ १३॥ भारत! उनके नाम ये हैं—भद्राश्व, केतुमाल, जम्बूद्वीप तथा उत्तरकुरु। उत्तरकुरु द्वीपमें पुण्यात्मा पुरुषोंका निवास है॥ १३॥