भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1263

इमानि तस्य रत्नानि तस्येमे रत्नपर्वताः ॥ २२ ॥ भूपाल! उस मेरुपर्वतके ही शिखरपर दैत्योंके साथ शुक्राचार्य निवास करते हैं। ये सब रत्न तथा ये रत्नमय पर्वत शुक्राचार्यके ही अधिकारमें हैं ॥ २२ ॥ तस्मात् कुबेरो भगवांश्चतुर्थ भागमश्नुते । ततः कलांशं वित्तस्य मनुष्येभ्यः प्रयच्छति ॥ २३ ॥ भगवान् कुबेर उन्हींसे धनका चतुर्थ भाग प्राप्त करके उसका उपभोग करते हैं और उस धनका सोलहवाँ भाग मनुष्योंको देते हैं ॥ २३ ॥ पार्श्वे तस्योत्तरे दिव्यं सर्वर्तुकुसुमैश्चितम् । कर्णिकारवनं रम्यं शिलाजालसमुद्गतम् ॥ २४ ॥ सुमेरुपर्वतके उत्तर भागमें समस्त ऋतुओंके फूलोंसे भरा हुआ दिव्य एवं रमणीय कर्णिकार (कनेर वृक्षोंका) वन है, जहाँ शिलाओंके समूह संचित हैं ॥ २४ ॥ तत्र साक्षात् पशुपतिर्दिव्यैर्भूतैः समावृतः । उमासहायो भगवान् रमते भूतभावनः ॥ २५ ॥ कर्णिकारमयीं मालां बिभ्रत्पादावलम्बिनीम् । त्रिभिर्नेत्रैः कृतोद्योतस्त्रिभिः सूर्यैरिवोदितैः ॥ २६ ॥ वहाँ दिव्य भूतोंसे घिरे हुए साक्षात् भूतभावन भगवान् पशुपति पैरोंतक लटकनेवाली कनेरके फूलोंकी दिव्य माला धारण किये भगवती उमाके साथ विहार करते हैं। वे अपने तीनों नेत्रोंद्वारा ऐसा प्रकाश फैलाते हैं, मानो तीन सूर्य उदित हुए हों ॥ २५-२६ ॥ तमुग्रतपसः सिद्धाः सुव्रताः सत्यवादिनः । पश्यन्ति न हि दुर्वृत्तैः शक्यो द्रष्टुं महेश्वरः ॥ २७ ॥ उग्र तपस्वी एवं उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले सत्यवादी सिद्ध पुरुष ही वहाँ उनका दर्शन करते हैं। दुराचारी लोगोंको भगवान् महेश्वरका दर्शन नहीं हो सकता ॥ २७ ॥ तस्य शैलस्य शिखरात् क्षीरधारा नरेश्वर । विश्वरूपापरिमिता भीमनिर्घातनिःस्वना ॥ २८ ॥ पुण्या पुण्यतमैर्जुष्टा गङ्गा भागीरथी शुभा । प्लवन्तीव प्रवेगेन ह्रदे चन्द्रमसः शुभे ॥ २९ ॥ नरेश्वर! उस मेरुपर्वतके शिखरसे दुग्धके समान श्वेतधारवाली, विश्वरूपा, अपरिमित शक्तिशालिनी, भयंकर वज्रपातके समान शब्द करनेवाली, परम पुण्यात्मा पुरुषों-द्वारा सेवित, शुभस्वरूपा पुण्यमयी भागीरथी गंगा बड़े प्रबल वेगसे सुन्दर चन्द्रकुण्डमें गिरती हैं ॥ २८-२९ ॥ तया ह्युत्पादितः पुण्यः स ह्रदः सागरोपमः । तां धारयामास तदा दुर्धरां पर्वतैरपि ॥ ३० ॥ शतं वर्षसहस्राणां शिरसैव पिनाकधृक् ।