महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1284, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंगिरिगह्वर, आत्रेय, भरद्वाज, स्तनपोषिक, प्रोषक, कलिंग, किरात जातियोंके जनपद, तोमर, हन्यमान और करभंजक इत्यादि ॥ ६६—६९ ॥ एते चान्ये जनपदाः प्राच्योदीच्यास्तथैव च । उद्देशमात्रेण मया देशाः संकीर्तिता विभो ॥ ७० ॥ राजन्! ये तथा और भी पूर्व और उत्तर दिशाके जनपद एवं देश मैंने संक्षेपसे बताये हैं ॥ ७० ॥ यथागुणबलं चापि त्रिवर्गस्य महाफलम् । दुह्येत धेनुः कामधुग् भूमिः सम्यगनुष्ठिता ॥ ७१ ॥ अपने गुण और बलके अनुसार यदि अच्छी तरह इस भूमिका पालन किया जाय तो यह कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली कामधेनु बनकर धर्म, अर्थ और काम तीनोंके महान् फलकी प्राप्ति कराती है ॥ ७१ ॥ तस्यां गृद्ध्यन्ति राजानः शूरा धर्मार्थकोविदाः । ते त्यजन्त्याहवे प्राणान् वसुगृद्धास्तरस्विनः ॥ ७२ ॥ इसीलिये धर्म और अर्थके काममें निपुण शूरवीर नरेश इसे पानेकी अभिलाषा रखते हैं और धनके लोभमें आसक्त हो वेगपूर्वक युद्धमें जाकर अपने प्राणोंका परित्याग कर देते हैं ॥ ७२ ॥ देवमानुषकायानां कामं भूमिः परायणम् । अन्योन्यस्यावलुम्पन्ति सारमेया यथामिषम् ॥ ७३ ॥ राजानो भरतश्रेष्ठ भोक्तुकामा वसुंधराम् । न चापि तृप्तिः कामानां विद्यतेऽद्यापि कस्यचित् ॥ ७४ ॥ देवशरीरधारी प्राणियोंके लिये और मानवशरीर-धारी जीवोंके लिये यथेष्ट फल देनेवाली यह भूमि उनका परम आश्रय होती है। भरतश्रेष्ठ! जैसे कुत्ते मांसके टुकड़ेके लिये परस्पर लड़ते और एक-दूसरेको नोचते हैं, उसी प्रकार राजा लोग इस वसुधाको भोगनेकी इच्छा रखकर आपसमें लड़ते और लूटपाट करते हैं; किंतु आजतक किसीको अपनी कामनाओंसे तृप्ति नहीं हुई ॥ ७३-७४ ॥ तस्मात् परिग्रहे भूमेर्यतन्ते कुरुपाण्डवाः । साम्ना भेदेन दानेन दण्डेनैव च भारत ॥ ७५ ॥ भारत! इस अतृप्तिके ही कारण कौरव और पाण्डव साम, दान, भेद और दण्डके द्वारा सम्पूर्ण वसुधापर अधिकार पानेके लिये यत्न करते हैं ॥ ७५ ॥ पिता भ्राता च पुत्राश्च खं द्यौश्च नरपुङ्गव । भूमिर्भवति भूतानां सम्यगच्छिद्रदर्शना ॥ ७६ ॥ नरश्रेष्ठ! यदि भूमिके यथार्थ स्वरूपका सम्पूर्णरूपसे ज्ञान हो जाय तो यह परमात्मासे अभिन्न होनेके कारण प्राणियोंके लिये स्वयं ही पिता, भ्राता, पुत्र, आकाशवर्ती पुण्यलोक