महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1287, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतश्रेष्ठ! इस कलियुगमें आयु-प्रमाणकी कोई मर्यादा नहीं है। यहाँ गर्भके बच्चे भी मरते हैं और नवजात शिशु भी मृत्युको प्राप्त होते हैं ॥ ७ ॥ महाबला महासत्त्वाः प्रज्ञागुणसमन्विताः । प्रजायन्ते च जाताश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥ जाताः कृतयुगे राजन् धनिनः प्रियदर्शनाः । प्रजायन्ते च जाताश्च मुनयो वै तपोधनाः ॥ ९ ॥ सत्ययुगमें महाबली, महान् सत्त्वगुणसम्पन्न, बुद्धिमान्, धनवान् और प्रियदर्शन मनुष्य उत्पन्न होते हैं और सैकड़ों तथा हजारों संतानोंको जन्म देते हैं, उस समय प्रायः तपस्याके धनी महर्षिगण जन्म लेते हैं ॥ ८-९ ॥ महोत्साहा महात्मानो धार्मिकाः सत्यवादिनः । प्रियदर्शना वपुष्मन्तो महावीर्या धनुर्धराः ॥ १० ॥ वराहा युधि जायन्ते क्षत्रियाः शूरसत्तमाः । त्रेतायां क्षत्रिया राजन् सर्वे वै चक्रवर्तिनः ॥ ११ ॥ राजन्! इसी प्रकार त्रेतायुगमें समस्त भूमण्डलके क्षत्रिय अत्यन्त उत्साही, महान् मनस्वी, धर्मात्मा, सत्यवादी, प्रियदर्शन, सुन्दर शरीरधारी, महापराक्रमी, धनुर्धर, वर पानेके योग्य, युद्धमें शूरशिरोमणि तथा मानवोंकी रक्षा करनेवाले होते हैं ॥ १०-११ ॥ सर्ववर्णाश्च जायन्ते सदा चैव च द्वापरे । महोत्साहा वीर्यवन्तः परस्परजयैषिणः ॥ १२ ॥ द्वापरमें सभी वर्णोंके लोग उत्पन्न होते हैं एवं वे सदा परम उत्साही, पराक्रमी तथा एक-दूसरेको जीतनेके इच्छुक होते हैं ॥ १२ ॥ तेजसाल्पेन संयुक्ताः क्रोधनाः पुरुषा नृप । लुब्धा अनृतकाश्चैव तिष्ये जायन्ति भारत ॥ १३ ॥ भरतनन्दन! कलियुगमें जन्म लेनेवाले लोग प्रायः अल्प-तेजस्वी, क्रोधी, लोभी तथा असत्यवादी होते हैं ॥ १३ ॥ ईर्ष्या मानस्तथा क्रोधो मायासूया तथैव च । तिष्ये भवति भूतानां रागो लोभश्च भारत ॥ १४ ॥ भारत! कलियुगके प्राणियोंमें ईर्ष्या, मान, क्रोध, माया, दोषदृष्टि, राग तथा लोभ आदि दोष रहते हैं ॥ १४ ॥ संक्षेपो वर्तते राजन् द्वापरेऽस्मिन् नराधिप । गुणोत्तरं हैमवतं हरिवर्षं ततः परम् ॥ १५ ॥ नरेश्वर! इस द्वापरमें भी गुणोंकी न्यूनता होती है। भारतवर्षकी अपेक्षा हैमवत तथा हरिवर्षमें उत्तरोत्तर अधिक गुण हैं ॥ १५ ॥