महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन लोकपालोंसे यथायोग्य मिलकर महेन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उन सबको सम्बोधित करके राजा नहुषके भीतर बुद्धिभेद उत्पन्न करनेके लिये प्रेरणा देते हुए कहा— ॥ २९ ॥
राजा देवानां नहुषो घोररूप- स्तत्र साह्यं दीयतां मे भवद्भिः । ते चाब्रुवन् नहुषो घोररूपो दृष्टिविषस्तस्य बिभीम ईश ॥ ३० ॥
‘इन देवताओंका राजा नहुष बड़ा भयंकर हो रहा है। उसे स्वर्गसे हटानेके कार्यमें आपलोग मेरी सहायता करें।’ यह सुनकर उन्होंने उत्तर दिया—‘देवेश्वर! नहुष तो बड़ा भयंकर रूपवाला है। उसकी दृष्टिमें विष है। अतः हमलोग उससे डरते हैं’ ॥ ३० ॥
त्वं चेद् राजानं नहुषं पराजये- स्ततो वयं भागमर्हाम शक्र । इन्द्रोऽब्रवीद् भवतु भवानपां पति- र्यमः कुबेरश्च मयाभिषेकम् ॥ ३१ ॥ सम्प्राप्नुवन्त्वद्य सहैव दैवतै रिपुं जयाम तं नहुषं घोरदृष्टिम् । ततः शक्रं ज्वलनोऽप्याह भागं प्रयच्छ मह्यं तव साह्यं करिष्ये । तमाह शक्रो भविताग्ने तवापि चेन्द्राग्न्योर्वै भाग एको महाक्रतौ ॥ ३२ ॥
‘शक्र! यदि आप हमारी सहायतासे राजा नहुषको पराजित करनेके लिये उद्यत हैं तो हम भी यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी हों।’ इन्द्रने कहा—‘वरुणदेव! आप जलके स्वामी हों, यमराज और कुबेर भी मेरे द्वारा अपने-अपने पदपर अभिषिक्त हों। देवताओंसहित हम सब लोग भयंकर दृष्टिवाले अपने शत्रु नहुषको परास्त करेंगे।’ तब अग्निने भी इन्द्रसे कहा—‘प्रभो! मुझे भी भाग दीजिये, मैं आपकी सहायता करूँगा।’ तब इन्द्रने उनसे कहा—‘अग्निदेव! महायज्ञमें इन्द्र और अग्निका एक सम्मिलित भाग होगा, जिसपर तुम्हारा भी अधिकार रहेगा’ ॥ ३२ ॥
शल्य उवाच
एवं संचिन्त्य भगवान् महेन्द्रः पाकशासनः । कुबेरं सर्वयक्षाणां धनानां च प्रभुं तथा ॥ ३३ ॥
शल्य कहते हैं— राजन्! इस प्रकार सोच-विचारकर पाकशासन भगवान् महेन्द्रने कुबेरको सम्पूर्ण यक्षों तथा धनका अधिपति बना दिया ॥ ३३ ॥