भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1306

किया? ॥ ६ ॥ यस्तमोऽर्क इवापोहन् परसैन्यममित्रहा । सहस्ररश्मिप्रतिमः परेषां भयमादधत् ॥ ७ ॥ जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार शत्रुसूदन भीष्म शत्रुसेनाका नाश करते थे। जिनका तेज सहस्र किरणोंवाले सूर्यके समान था, जिन्होंने शत्रुओंको भयभीत कर रखा था ॥ ७ ॥ अकरोद् दुष्करं कर्म रणे पाण्डुसुतेषु यः । ग्रसमानमनीकानि य एनं पर्यवारयन् ॥ ८ ॥ कृतिनं तं दुराधर्षं संजयास्य त्वमन्तिके । कथं शान्तनवं युद्धे पाण्डवाः प्रत्यवारयन् ॥ ९ ॥ जिन्होंने युद्धमें पाण्डवोंपर दुष्कर पराक्रम किया था तथा जो उनकी सेनाका निरन्तर संहार कर रहे थे, उन अस्त्रविद्याके ज्ञाता दुर्जय वीर भीष्मजीको जिन्होंने रोका है, वे कौन हैं? संजय! तुम तो उनके पास ही थे, पाण्डवोंने युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मको किस प्रकार आगे बढ़नेसे रोका? ॥ ८-९ ॥ निकृन्तन्तमनीकानि शरदंष्ट्रं मनस्विनम् । चापव्यात्ताननं घोरमसिजिह्वं दुरासदम् ॥ १० ॥ अनर्हं पुरुषव्याघ्रं ह्रीमन्तमपराजितम् । पातयामास कौन्तेयः कथं तमजितं युधि ॥ ११ ॥ जो शत्रुपक्षकी सेनाओंका निरन्तर उच्छेद करते थे, बाण ही जिनकी दाढ़ें थीं, धनुष ही खुला हुआ मुख था, तलवार ही जिनकी जिह्वा थी, उन भयंकर एवं दुर्धर्ष पुरुषसिंह भीष्मको कुन्तीनन्दन अर्जुनने युद्धमें कैसे मार गिराया? मनस्वी भीष्म इस प्रकार पराजयके योग्य नहीं थे। वे लज्जाशील और पराजय-शून्य थे ॥ उग्रधन्वानमुग्रेषुं वर्तमानं रथोत्तमे । परेषामुत्तमाङ्गानि प्रचिन्वन्तमथेषुभिः ॥ १२ ॥ जो उत्तम रथपर बैठकर भयंकर धनुष और भयानक बाण लिये शत्रुओंके मस्तकोंको सायकोंद्वारा काट-काटकर उनके ढेर लगा रहे थे ॥ १२ ॥ पाण्डवानां महत् सैन्यं यं दृष्ट्वोद्यतमाहवे । कालाग्निमिव दुर्धर्षं समचेष्टत नित्यशः ॥ १३ ॥ पाण्डवोंकी विशाल सेना दुर्धर्ष कालाग्निके समान जिन्हें युद्धके लिये उद्यत देख सदा काँपने लगती थी ॥ १३ ॥ परिकृष्य स सेनां तु दशरात्रमनीकहा । जगामास्तमिवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १४ ॥