महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1315, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहान्तं भारमुद्यम्य विश्रुतं सार्वलौकिकम् ॥ ७५ ॥ दृष्ट्वा विनिहतं भीष्मं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः । श्रोश्यामि तानि दुःखानि दुर्योधनकृतान्यहम् ॥ ७६ ॥ जिन्होंने सम्पूर्ण जगत्में विख्यात इस युद्धके महान् भारको अपनी भुजाओंपर उठा रखा था, उन्हीं भीष्मजीको मारा गया देख मेरे पुत्र भारी शोकमें पड़ गये होंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं दुर्योधनके द्वारा प्रकट किये हुए उन दुःखोंको सुनूँगा ॥ ७५-७६ ॥ तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यद् वृत्तं तत्र संजय । यद् वृत्तं तत्र संग्रामे मन्दस्याबुद्धिसम्भवम् ॥ ७७ ॥ अपनीतं सुनीतं यत् तन्ममाचक्ष्व संजय । इसलिये संजय! मुझसे वहाँका सारा वृत्तान्त कहो। मूर्ख दुर्योधनके अज्ञानके कारण उस युद्धमें अन्याय और न्यायकी जो-जो बातें संघटित हुई हों, उन सबका वर्णन करो ॥ ७७ १/२ ॥ यत् कृतं तत्र संग्रामे भीष्मेण जयमिच्छता ॥ ७८ ॥ तेजोयुक्तं कृतास्त्रेण शंस तच्चाप्यशेषतः । विजयकी इच्छा रखनेवाले अस्त्रवेत्ता भीष्मजीने उस युद्धमें अपनी तेजस्विताके अनुरूप जो-जो कार्य किया हो, वह सभी पूर्णरूपसे मुझे बताओ ॥ ७८ १/२ ॥ तथा तदभवद् युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥ ७९ ॥ क्रमेण येन यस्मिंश्च काले यच्च यथाभवत् ॥ ८० ॥ कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंका वह युद्ध जिस समय, जिस क्रमसे और जिस रूपमें हुआ था, वह सब कहो ॥ ७९-८० ॥
इति श्रीमन्महाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि धृतराष्ट्रप्रश्ने चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत श्रीमद्भगवद्गीतापर्वमें धृतराष्ट्रका प्रश्नविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥