भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1326

श्वेतैश्छत्रैः पताकाभिर्ध्वजवारणवाजिभिः । तान्यनीकानि शोभन्ते रथैरथ पदातिभिः ॥ १५ ॥ श्वेत छत्रों, पताकाओं, ध्वजों, हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदल सैनिकोंसे उन समस्त सेनाओंकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १५ ॥

भेरीपणवशब्दैश्च दुन्दुभीनां च निःस्वनैः । रथनेमिनिनादैश्च बभूवाकुलिता मही ॥ १६ ॥ भेरी, पणव, दुन्दुभि आदि वाद्योंकी ध्वनियों तथा रथके पहियोंके घर्घर शब्दोंसे वहाँकी सारी भूमि व्याप्त हो रही थी ॥ १६ ॥

काञ्चनाङ्गदकेयूरैः कार्मुकैश्च महारथाः । भ्राजमाना व्यराजन्त साग्नयः पर्वता इव ॥ १७ ॥ सोनेके अंगद और केयूर नामक बाहुभूषण तथा धनुष धारण किये महारथी वीर अग्नियुक्त पर्वतोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १७ ॥

तालेन महता भीष्मः पञ्चतारेण केतुना । विमलादित्यसंकाशस्तस्थौ कुरुचमूपरि ॥ १८ ॥ कौरवसेनाके प्रधान सेनापति भीष्म भी ताड़ और पाँच तारोंके चिह्नसे युक्त विशाल ध्वजा-पताकासे सुशोभित रथपर जा बैठे। उस समय वे निर्मल तेजोमय सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ १८ ॥

ये त्वदीया महेष्वासा राजानो भरतर्षभ । अवर्तन्त यथादेशं राजञ्शान्तनवस्य ते ॥ १९ ॥ भरतश्रेष्ठ! महाराज! आपकी सेनाके समस्त महाधनुर्धर भूपाल सेनापति भीष्मकी आज्ञाके अनुसार चलते थे ॥ १९ ॥

स तु गोवासनः शैब्यः सहितः सर्वराजभिः । ययौ मातङ्गराजेन राजार्हेण पताकिना । पद्मवर्णस्त्वनीकानां सर्वेषामग्रतः स्थितः ॥ २० ॥ अश्वत्थामा ययौ यत्तः सिंहलाङ्गूलकेतुना । गोवासनदेशके स्वामी महाराज शैब्य अपने अधीन राजाओंके साथ पताकासे सुशोभित राजोचित गजराजपर आरूढ़ हो युद्धके लिये चले। कमलके समान कान्तिमान् अश्वत्थामा सिंहकी पूँछके चिह्नसे युक्त ध्वजा-पताकावाले रथपर आरूढ़ हो समस्त सेनाओंके आगे रहकर चलने लगे ॥ २० १/२ ॥

श्रुतायुधश्चित्रसेनः पुरुमित्रो विविंशतिः ॥ २१ ॥ शल्यो भूरिश्रवाश्चैव विकर्णश्च महारथः । एते सप्त महेष्वासा द्रोणपुत्रपुरोगमाः ॥ २२ ॥ स्यन्दनैर्वरवर्माणो भीष्मस्यासन् पुरोगमाः ।