भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1378

सम्बन्ध-उपर्युक्त श्लोकमें भगवान्‌ने युद्धका फल राज्यसुख या स्वर्गकी

प्राप्तितक बतलाया, किंतु अर्जुनने तो पहले ही कह दिया था कि इस लोकके

राज्यकी तो बात ही क्या है, मैं तो त्रिलोकीके राज्यके लिये भी अपने कुलका

नाश नहीं करना चाहता; अतः जिसे राज्यसुख और स्वर्गकी इच्छा न हो उसको

किस भावसे युद्ध करना चाहिये, यह बात अगले श्लोकमें बतलायी जाती है—

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।। ३८ ।।

जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर उसके बाद

युद्धके लिये तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको नहीं प्राप्त

होगा ।। ३८ ।।

सम्बन्ध-यहाँतक भगवान्ने सांख्ययोगके सिद्धान्तसे तथा क्षात्रधर्मकी

दृष्टिसे युद्धका औचित्य सिद्ध करके अर्जुनको समतापूर्वक युद्ध करनेके लिये

आज्ञा दी; अब कर्मयोगके सिद्धान्तसे युद्धका औचित्य बतलानेके लिये

कर्मयोगके वर्णनकी प्रस्तावना करते हैं—

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।

बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ।। ३९ ।।

हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोगके विषयमें कही गयी और अब तू

इसको कर्मयोगके विषयमें सुन३—जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मोंके बन्धन-को

भलीभाँति त्याग देगा यानी सर्वथा नष्ट कर डालेगा ।। ३९ ।।

सम्बन्ध-इस प्रकार कर्मयोगके वर्णनकी प्रस्तावना करके अब उसका

रहस्यपूर्ण महत्त्व बतलाते हैं—

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो३ न विद्यते ।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।। ४० ।।

इस कर्मयोगमें आरम्भका अर्थात् बीजका नाश नहीं है और उलटा फलरूप

दोष भी नहीं है; बल्कि इस कर्मयोगरूप धर्मका थोड़ा-सा भी साधन जन्म-

मृत्युरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है३ ।। ४० ।।

सम्बन्ध-इस प्रकार कर्मयोगका महत्त्व बतलाकर अब उसके आचरणकी

विधि बतलानेके लिये पहले उस कर्मयोगमें परम आवश्यक जो सिद्ध

कर्मयोगीकी निश्चयात्मिका स्थायी समबुद्धि है, उसका और कर्मयोगमें बाधक

जो सकाम मनुष्योंकी भिन्न-भिन्न बुद्धियाँ हैं, उनका भेद बतलाते हैं—

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।। ४१ ।।