भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1385, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1385

तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे

स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥

जैसे नाना नदियोंके जल सब ओरसे परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठावाले समुद्रमें

उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ

पुरुषमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं,३ वही पुरुष

परम शान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंको चाहनेवाला नहीं ॥ ७० ॥

सम्बन्ध — 'स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है?' अर्जुनका यह चौथा प्रश्न परमात्माको

प्राप्त हुए पुरुषके विषयमें ही था; किंतु यह प्रश्न आचरणविषयक होनेके कारण

उसके उत्तरमें चौंसठवें श्लोकसे यहाँतक किस प्रकार आचरण करनेवाला

मनुष्य शीघ्र स्थितप्रज्ञ बन सकता है, कौन नहीं बन सकता और जब मनुष्य

स्थितप्रज्ञ हो जाता है उस समय उसकी कैसी स्थिति होती है- ये सब बातें

बतलायी गयीं। अब उस चौथे प्रश्नका स्पष्ट उत्तर देते हुए स्थितप्रज्ञ पुरुषके

आचरणका प्रकार बतलाते हैं-

विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।

निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥

जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको त्यागकर ममतारहित, अहंकाररहित और

स्पृहारहित हुआ विचरता है, ३ वही शान्तिको प्राप्त होता है अर्थात् वह शान्तिको

प्राप्त है ॥

सम्बन्ध- इस प्रकार अर्जुनके चारों प्रश्नोंका उत्तर देनेके अनन्तर अब

स्थितप्रज्ञ पुरुषकी स्थितिका महत्त्व बतलाते हुए इस अध्यायका उपसंहार करते

हैं-

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।

स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥

हे अर्जुन! यह ब्रह्मको प्राप्त हुए पुरुषकी स्थिति है; इसको प्राप्त होकर

योगी कभी मोहित नहीं होता ३ और अन्तकालमें भी इस ब्राह्मी स्थितिमें स्थित

होकर ब्रह्मानन्दको प्राप्त हो जाता है ॥ ७२ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि

श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे

सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ भीष्मपर्वणि तु षड्विंशोऽध्यायः

॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या

एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें सांख्ययोग