भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 141

शल्यकी बात सुनकर कुन्तीपुत्र महाबाहु युधिष्ठिर मद्रराजसे यह वचन बोले— ॥ २२ ॥ भवान् कर्णस्य सारथ्यं करिष्यति न संशयः । तत्र तेजोवधः कार्यः कर्णस्यार्जुनसंस्तवः ॥ २३ ॥ ‘मामाजी! जब अर्जुनके साथ कर्णका युद्ध होगा, उस समय आप कर्णका सारथ्य करेंगे, इसमें संशय नहीं है। उस समय आप अर्जुनकी प्रशंसा करके कर्णके तेज और उत्साहका नाश करें (यही मेरा अनुरोध है)’ ॥

शल्य उवाच एवमेतत् करिष्यामि यथा मां सम्प्रभाषसे । यच्चान्यदपि शक्ष्यामि तत् करिष्याम्यहं तव ॥ २४ ॥ **शल्य बोले—**राजन्! तुम जैसा कह रहे हो, ऐसा ही करूँगा और भी (तुम्हारे हितके लिये) जो कुछ मुझसे हो सकेगा, वह सब तुम्हारे लिये करूँगा ॥

वैशम्पायन उवाच ततस्त्वामन्त्र्य कौन्तेयाञ्छल्यो मद्राधिपस्तदा । जगाम सबलः श्रीमान् दुर्योधनमरिंदम ॥ २५ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुदमन जनमेजय! तदनन्तर समस्त कुन्तीकुमारोंसे विदा लेकर श्रीमान् मद्रराज शल्य अपनी सेनाके साथ दुर्योधनके यहाँ चले गये ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि शल्यगमने अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें शल्यगमनविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

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