भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1472, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1472

**श्रीभगवान्ने कहा—**परम अक्षर 'ब्रह्म' है,<sup></sup> अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा 'अध्यात्म'<sup></sup> नामसे कहा जाता है तथा भूतोंके भावको उत्पन्न करनेवाला जो त्याग है,<sup></sup> वह 'कर्म' नामसे कहा गया है ।। ३ ।।

अधिभूतं क्षरो भावः<sup></sup> पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ।। ४ ।।

उत्पत्ति-विनाशधर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष अधिदेव<sup></sup> है और हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीरमें मैं वासुदेव ही अन्तर्यामीरूपसे अधियज्ञ हूँ<sup></sup> ।। ४ ।।

अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ।। ५ ।।

जो पुरुष अन्तकालमें भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूपको प्राप्त होता है<sup></sup>—इसमें कुछ भी संशय नहीं है<sup></sup> ।। ५ ।।

**सम्बन्ध—**यहाँ यह बात कही गयी कि भगवान्‌का स्मरण करते हुए मरनेवाला भगवान्‌को ही प्राप्त होता है। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि केवल भगवान्‌के स्मरणके सम्बन्धमें ही यह विशेष नियम है या सभीके सम्बन्धमें है; इसपर कहते हैं—

यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ।। ६ ।।

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अन्तकालमें जिस-जिस भी भावको<sup></sup> स्मरण करता हुआ शरीरका त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह सदा उसी भावसे भावित रहा है<sup></sup> ।। ६ ।।

तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ।। ७ ।।

इसलिये हे अर्जुन! तू सब समयमें निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर।<sup></sup> इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिसे युक्त होकर<sup></sup> तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा ।। ७ ।।

अभ्यासयोगयुक्तेन<sup></sup> चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।। ८ ।।

हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वरके ध्यानके अभ्यासरूप योगसे युक्त, दूसरी ओर न जानेवाले चित्तसे निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश-स्वरूप दिव्य पुरुषको अर्थात् परमेश्वरको ही प्राप्त होता है<sup></sup> ।। ८ ।।

कविं पुराणमनुशासितार