महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1492, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है⁵। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान⁶ कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता⁷ ॥ ३१ ॥
**सम्बन्ध—**अब दो श्लोकोंमें भगवान् अच्छी-बुरी जातिके कारण होनेवाली विषमताका अपनेमें अभाव दिखलाते हुए शरणागतिरूप भक्तिका महत्त्व प्रतिपादन करके अर्जुनको भजन करनेकी आज्ञा देते हैं—
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि१ स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि१ यान्ति परां गतिम् ॥ ३२ ॥
हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि२—चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकर३ परमगतिको ही प्राप्त होते हैं ॥ ३२ ॥
किं पुनर्ब्राह्मणाः३ पुण्या भक्ता३ राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥
फिर इसमें कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परम गतिको प्राप्त होते हैं। इसलिये तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्यशरीरको प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन कर३ ॥
**सम्बन्ध—**पिछले श्लोकमें भगवान्ने अपने भजनका महत्त्व दिखलाया और अन्तमें अर्जुनको भजन करनेके लिये कहा। अतएव अब भगवान् अपने भजनका अर्थात् शरणागतिका प्रकार बतलाते हुए अध्यायकी समाप्ति करते हैं—
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां४ नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥
मुझमें मनवाला हो,५ मेरा भक्त बन,६ मेरा पूजन करनेवाला हो,३ मुझको प्रणाम कर३। इस प्रकार आत्माको मुझमें नियुक्त करके३ मेरे परायण४ होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा५ ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम
नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ भीष्मपर्वणि तु त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्में, श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥ भीष्मपर्वमें तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥