भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1505

जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तवमें जन्मरहित, अनादि और लोकोंका महान् ईश्वर तत्त्वसे जानता है,<sup></sup> वह मनुष्योंमें ज्ञानवान् पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है॥

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः$^७^८^९$ क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥ अहिंसा<sup></sup> समता<sup></sup> तुष्टिस्तपो<sup></sup> दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥

निश्चय करनेकी शक्ति यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा,<sup></sup> सत्य,<sup></sup> इन्द्रियोंका वशमें करना, मनका निग्रह तथा सुख-दुःख,<sup></sup> उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय<sup></sup> तथा अहिंसा, समता, संतोष तप,<sup></sup> दान,<sup></sup> कीर्ति और अपकीर्ति—ऐसे ये प्राणियोंके नाना प्रकारके भाव मुझसे ही होते हैं<sup>१०</sup>॥ ४-५॥

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो<sup>११</sup> मनवस्तथा। मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥

सात महर्षिजन,<sup></sup> चार उनसे भी पूर्वमें होनेवाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु<sup></sup>—ये मुझमें भाववाले सब-के-सब मेरे संकल्पसे उत्पन्न हुए हैं<sup></sup>, जिनकी संसारमें यह सम्पूर्ण प्रजा है॥ ६॥

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। सोऽविकम्पेन योगेन<sup></sup> युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥

जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूतिको<sup></sup> और योगशक्तिको<sup></sup> तत्त्वसे जानता है,<sup></sup> वह निश्चल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥ ७॥

सम्बन्ध—भगवान्‌के प्रभाव और विभूतियोंके ज्ञानका फल अविचल भक्तियोगकी प्राप्ति बतलायी गयी, अब दो श्लोकोंमें उस भक्तियोगकी प्राप्तिका क्रम बतलाते हैं—

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥

मैं वासुदेव ही सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्तिका कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत् चेष्टा करता है—इस प्रकार समझकर<sup></sup> श्रद्धा और भक्तिसे युक्त बुद्धिमान् भक्तजन मुझ परमेश्वरको ही निरन्तर भजते हैं<sup></sup>॥ ८॥